Monday, September 24, 2012
तीसरे मोर्चे की संभावनाएं
सवाल उठ रहे हैं, क्या देश में एक बार फिर तीसरे मोर्चे के गठन की सुगबुगाहट शुरू हो गई है? क्या सरकार की गिरती साख तथा विपक्ष में पड़ती दरार के कारण मुलायम की तीसरे मोर्चे को जिंदा करने की कोशिशें परवान चढ़ेंगी? यहां यह भी देखना होगा कि यदि तीसरा मोर्चा अस्तित्व में आता है, तो उसमें कौन-कौन-से दल शामिल होंगे, उनकी विचारधाराओं के बीच किस प्रकार सामंजस्य बैठेगा, फिर उसमें मौजूद क्षेत्रीय दल किस नीति के तहत जनता के पास वोट मांगने जाएंगे? यहां एक सवाल और उठता है कि क्या तीसरे मोर्चे का संभावित गठन राजनीति में चौथे मोर्चे के गठन का भी मार्ग प्रशस्त नहीं करेगा? दरअसल, क्षेत्रीय नेताओं में इतने मतभेद हैं कि उनका एक मंच पर आना असंभव लगता है और यदि वे एक साथ आ भी गए, तो साथ-साथ रहेंगे कितने दिन? बहरहाल, मुलायम सिंह यादव इन दिनों जो राजनीति कर रहे हैं, उससे साफ है कि वे जल्द से जल्द आम चुनाव चाहते हैं। भाजपा तो इसी प्रयास के तहत हमलावर की मुद्रा में है। प्रस्तुत है देश में मध्यावधि चुनाव और तीसरे मोर्चे की संभावनाओं पर रिपोर्ट
मुलायम सिंह ने रचा ताना-बाना
अगला लोकसभा चुनाव भले ही दूर हो, लेकिन 2014 से बड़ी उम्मीद लगाए सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव ने संभावित 'तीसरा मोर्चा' का ताना-बाना अभी से बुनना शुरू कर दिया है। दिलचस्प पहलू यह भी है कि मुलायम की इस रणनीति से कांग्रेस भी असहज नहीं महसूस कर रही है। कुछ माह पहले तक देश में मध्यावधि चुनाव की संभावना जताने वाली सपा अब 2014 में ही चुनाव मानकर चल रही है। ऐसे में उसे तीसरे मोर्चे की जमीन तैयार करने के लिए यह मौका सबसे मुफीद लग रहा है। एक तरफ वह 80 लोकसभा सीटों वाले उत्तर प्रदेश में अभी से अपने प्रत्याशी तय कर रही है तो दूसरी तरफ समान विचारधारा वाले दलों की एकजुटता के जरिए केंद्रीय राजनीति में अपनी अहमियत भी साबित कर रही है।
रणनीति के आधार स्तंभ
मुलायम सिंह की रणनीति क्षेत्रीय दलों पर टिकी है। उन्हें लगता है कि आगामी लोकसभा चुनावों में संसद में बहुमत चूंकि किसी के पास नहीं होगा इसलिये ज्यादा सांसदों वाले दलों की भूमिका प्रभावी हो जाएगी। उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों के नतीजों ने उनमें उत्साह का संचार किया है। देश के इस सबसे बड़े राज्य में लोकसभा की 80 सीटें हैं। मुलायम महसूस कर रहे हैं कि जरूरत पड़ने पर वामपंथी दलों की मदद भी ली जा सकती है। शुरुआत फिलहाल, कोयला ब्लॉक आवंटन में गड़बड़ी के खिलाफ समान सोच वाले दलों की एकजुटता से हुई है,लेकिन यह यहीं नहीं रुकेगा। दिलचस्प पहलू यह भी है कि मुलायम की इस रणनीति से कांग्रेस भी असहज नहीं महसूस कर रही है। वामदलों, गैर कांग्रेस व गैर भाजपा कुछ दलों को सपा के साथ विश्वास का संकट हो सकता है, फिर भी मुद्दों के आधार पर वे मौजूदा दोस्ती को जरूरी मान रहे हैं। इन दलों की उसी सोच का नतीजा है कि सपा, माकपा, भाकपा, तेलगू देशम पार्टी ने बैठक करके कोयला ब्लॉक आवंटन में गड़बड़ी की न्यायिक जांच और संसद का गतिरोध दूर करने के लिए हाथ मिला लिया। खास बात यह है कि दोस्ती का यह सिलसिला आगे भी जारी रखने पर ये दल राजी हो गए हैं, जबकि, दूसरे दलों को जोड़ने की भी संभावनाएं तलाशी जाने लगी हैं। यह पूछने पर कि इस नए गठजोड़ की आगे की रणनीति क्या है? मुलायम से कहा, 'यह शुरुआत है। अब हम आगे भी बैठकें करके रणनीति बनाते रहेंगे'।
वामपंथीः सरकार में रहकर भी विपक्षी
तीसरा मोर्चा पिछले तीन दशक में कई बार चर्चा में आया, सत्ता में भी आया और विलुप्त हो गया। केंद्र की सरकार ने वामपंथियों के शामिल होने का देश भारी नुकसान उठा रहा है। वामपंथियों की टोली सरकार में रहकर ही विपक्ष की भाषा बोलती है और मनमाफिक निर्णय न होने से तीसरे मोर्चे की बात उछालने लगती है। देश में क्षेत्रीय दलों के बढ़ते प्रभाव के कारण पूर्णबहुमत की सरकारों का गठन मुश्किल होता जा रहा है। अब तो यह लगने लगा है कि जब तीसरे मोर्चे का शोर सुनाई दे तो समझिए कि कोई सरकार अपने को परेशानी में समझकर अपनी सीमाएं सुरक्षित करने की कोशिश कर रही है। सब जानते हैं कि देश के राजनीतिक समीकरण ऐसे हैं कि कोई भी राजनीतिक दल केंद्र सरकार को अस्थिर करने की कोशिश में नहीं पड़ सकता। वामपंथी चाहे जितना चिल्लाएं। वे जानते हैं कि कांग्रेस को अस्थिर करने का मतलब देश में भारतीय जनता पार्टी या प्रदेशों में शिवसेना जैसी सरकारों का मार्ग प्रशस्त करना है। जो लोग तीसरे मोर्चे के लिए बहुत उतावले हैं खुद उन्हें भविष्य में अपने बहुमत का पता नहीं है। कोई उनसे पूछे कि क्या वे स्वयं अपनी सरकारों का कार्यकाल पूरा कर सके? मोर्चे की बात तो बहुत दूर की है। तीसरे मोर्चे की पहल अभी तो सारे वामपंथी नहीं कर रहे हैं क्योंकि वे जानते हैं कि इस पहल में छीछालेदर के अलावा कोई दम नहीं है।
बड़ा सवाल, कौन करेगा नेतृत्व
भारतीय राजनीति का इतिहास रहा है जिसमें सत्ता हमेशा ही विचारधारा पर भारी पड़ती है। तीसरा मोर्चा बनाना कोई कठिन काम नहीं है लेकिन वह तब तक धरातल पर नहीं उतर सकता जब तक कि दलों की एक राय ना बने। बेशक, कुछ क्षेत्रीय दलों ने चुनावों में अच्छा प्रदर्शन किया है। साथ ही जनता का जनादेश भी उन्हें मिला है। अब सवाल यह है की विधानसभा चुनावों का प्रदर्शन लोकसभा चुनावों में दोहराना कैसे मुमकिन होगा। चलिये मान लेते है कि घटा-जोड़ कर कुछ क्षेत्रीय दल एक हो जाते है और हर आम चुनावों की तरह आगामी लोक सभा चुनावों में भी तीसरे या चौथे मोर्चे का गठन कर लेते है। लेकिन फिर वही समस्या सामने पेश आएगी की सत्ता मिलने पर उसकी बागडौर कौन संभाले। सच्चाई तो यह है की तीसरा मोर्चा कभी स्थिर हो ही नहीं सकता, और राजनीति में जो स्थिर नहीं होता, उसे जल्दी ही सत्ता से बेदखल करने में देर नहीं लगती। कई दलों का प्रभुत्व प्रभावशाली नेताओं के हाथ में है लेकिन उनकी प्रासंगिकता तब तक नहीं है जब तक किसी बड़े राजनीतिक दल से उनका गठबंधन न हो।
तीसरे मोर्चे का इतिहास
इतिहास के पन्नों को उलट कर देखें तो अस्सी के दशक के आसपास लोकदल के चरण सिंह का उत्तर प्रदेश के जाट प्रभुत्व वाले ग्रामीण इलाके में जबर्दस्त सिक्का चलता था। वही दूसरी तरफ भाजपा उत्तर भारत के शहरी इलाकों में धीरे धीरे लोकप्रिय पार्टी बन रही थी। लोकदल और भाजपा का किसी भी प्रकार का चुनावी गठबंधन काँग्रेस (आई) को भारत की हिन्दी बेल्ट में नुकसान पहुंचाने में लगा हुआ था।
ममता, पवार और नीतीश भी हो सकते हैं बड़े खिलाड़ी
तृणमूल कांग्रेस सुप्रीमो ममता बनर्जी और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी चीफ शरद पवार भी खेल के प्रमुख खिलाड़ी हो सकते हैं। दोनों पुराने कांग्रेसी हैं लेकिन इन्होंने समय रहते जान लिया था कि काँग्रेस से जुड़े रहने से इनकी राजनीतिक हसरते कभी पूरी नहीं होंगी। आगे चलकर राहें तो जुदा हो गयी लेकिन दिल अभी भी काँग्रेस से ही लगा हुआ है। दोनों को लगता है कि तीसरे मोर्चे के फ़ेल होने पर उनके राजनीतिक जीवन का अंत भी हो सकता है इसलिये बेहतर है की जरूरत के हिसाब से अपने को ढाल लिया जाए। अब जब दोनों ने कांग्रेस से दिल लगाकर अपनी छवि केन्द्रीय स्तर की बना ली है तो अब अपनी राजनीतिक ताकत का एहसास कराते रहते है। उधर जनता दल यूनाईटेड के नेता और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के लिए इस समय धर्मनिरपेक्षता से बड़ा कोई मुद्दा ही नहीं बचा है। भाजपा से जुड़कर नीतीश कुमार ने बिहार में अपनी अच्छी पकड़ और दिल्ली तक अपनी पहचान भी बना ली है, लेकिन नीतीश को अच्छी तरह से मालूम है कि भाजपा की राष्ट्रीय स्तर की छवि ही नीतीश को प्रधानमंत्री की कुर्सी तक ले जाने में मदद कर सकती है।
इन पर टिकी होंगी नजरें
समाजवादी पार्टीः आगामी लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी यदि 40 से अधिक सीटें लाने में कामयाब होती है, तो सरकार का गठन उनके बिना नहीं होगा और यदि उत्तर प्रदेश के लिहाज से देखें, तो उनकी पार्टी इस वक्त 40 सीटें निकालने की स्थिति में तो है ही। सपा के वोटों का आधार मुस्लिम के साथ ही पिछड़ों का वोट है। प्रदेश में सवर्ण मतों की भूमिका भी अहम हो सकती है।
बहुजन समाज पार्टीः उत्तर प्रदेश में मायावती की बहुजन समाज पार्टी भी अच्छा दम-खम रखती है। विधानसभा में सत्ता से बाहर हुई यह पार्टी इस समय लोकसभा चुनावों की तैयारी में पूरे दम से जुटी है। पार्टी का अपना वोट बैंक हैं, दलितों के साथ यदि मुस्लिम वोट वह खींच लेती है तो तस्वीर का रुख पलट सकता है।
बीजू जनता दलः ओडिशा में लोकसभा की 21 सीटें हैं। नवीन पटनायक का बीजू जनता दल हालांकि यहां प्रमुख खिलाड़ी नहीं है लेकिन राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन का घटक दल रहते हुए उसने यहां बड़ी हैसियत हासिल कर ली है।
तृणमूल कांग्रेसः पश्चिम बंगाल में सत्तारूढ़ यह पार्टी 42 सीटों पर अपना प्रभाव साबित कर सकती है हालांकि वहां के हालात थोड़े उसके प्रतिकूल हुए हैं और वामपंथी गठबंधन का समर्थन बढ़ा है।
द्रमुक-अन्नाद्रमुकः तमिलनाडु में प्रभावी दोनों दलों के बीच 39 सीटों पर संघर्ष है। द्रमुक कांग्रेस के खेमे में है और अन्नाद्रमुक तटस्थ। लोकसभा चुनावों के बाद राज्य के चुनावी सूरमा रंग दिखा सकते हैं।
शिवसेनाः महाराष्ट्र की प्रमुख राजनीतिक पार्टी शिवसेना और राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना भी दमदार राजनीतिक पार्टियां हैं। भाजपा की करीबी है शिवसेना जबकि राज ठाकरे ने अभी किसी दल से नजदीकी दिखाई नहीं है। महाराष्ट्र में लोकसभा की 48 सीटें हैं।
चुनावों के बाद जम्मू-कश्मीर में सत्तासीन नेशनल कांफ्रेंस, महबूबा मुफ्ती की पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी, झारखण्ड में झारखण्ड मुक्ति मोर्चा पर भी तीसरे मोर्चे के लिए प्रयासरत नेताओं की नजरें जा सकती हैं।
सर्वेक्षण- एनडीए आगे, यूपीए पीछे
एनडीटीवी ने पहला चुनावी सर्वेक्षण किया है। उसका निष्कर्ष है कि मौजूदा हालात में यदि मध्यावधि चुनाव हो गए तो कांग्रेस को खासा नुकसान होगा और उसकी सीटें 206 से घटकर 127 पर पहुंच जाएंगी। उसके सहयोगियों की सीटें 58 रहने का अनुमान है। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सबसे बड़ी ताकत बनकर उभर सकता है। उसकी सीटें 116 से बढ़कर 207 होने का अनुमान है। इसके साथ ही भाजपा के सहयोगियों की संख्या भी दोगुनी हो जाएगी। अन्य पार्टियों की सीट 117 से बढ़कर 151 हो जाएंगी और समाजवादी पार्टी चीफ मुलायम सिंह अपनी सीटें 23 से 33 होने के बाद किंगमेकर की भूमिका निभा सकेंगे। यह सर्वेक्षण चुनाव बाद क्षेत्रीय दलों की भूमिका बढ़ने का संकेत दे रहा है।
शह और मात का मुद्दा- विदेशी निवेश
केंद् सरकार ने जब मल्टी ब्रांड रिटेल के क्षेत्र को विदेशी निवेश के लिए खोलने की बात की तो देश में तूफ़ान उठ खड़ा हुआ है। तृणमूल कांग्रेस ने समर्थन वापस लिया तो सरकार पर संकट मंडराने लगा। इसी बीच सरकार ने विदेशी निवेश की अधिसूचना जारी कर दी। इसके मुताबिक, विदेशी कंपनियां सिर्फ उन शहरों में ही अपने स्टोर खोल सकेंगी जिनकी आबादी दस लाख या उससे ज्यादा है। 2011 के जनसंख्या आंकलन के मुताबिक पूरे देश के करीब 8000 शहरों में से सिर्फ 53 ही ऐसे शहर हैं जहां की आबादी दस लाख या उससे ज्यादा है। क्या है विदेशी निवेश और इसका देश में क्या असर होने जा रहा है, आंकलन करती अनिल दीक्षित की रिपोर्ट-
क्या है प्रत्यक्ष विदेशी निवेश
सामान्य शब्दों में किसी एक देश की कंपनी का दूसरे देश में निवेश प्रत्यक्ष विदेशी निवेश यानी एफडीआई कहलाता है। ऐसे निवेश से निवेशकों को दूसरे देश की उस कंपनी के प्रबंधन में कुछ हिस्सा हासिल हो जाता है जिसमें उसका पैसा लगता है। आमतौर पर माना यह जाता है कि किसी निवेश को एफडीआई का दर्जा दिलाने के लिए कम-से-कम कंपनी में विदेशी निवेशक को 10 फीसदी शेयर खरीदना पड़ता है। इसके साथ उसे निवेश वाली कंपनी में मताधिकार भी हासिल करना पड़ता है। एफडीआई दो तरह के हो सकते हैं-इनवार्ड और आउटवार्ड। इनवार्ड एफडीआई में विदेशी निवेशक भारत में कंपनी शुरू कर यहां के बाजार में प्रवेश कर सकता है। इसके लिए वह किसी भारतीय कंपनी के साथ संयुक्त उद्यम बना सकता है या पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक कंपनी यानी सब्सिडियरी शुरू कर सकता है। अगर वह ऐसा नहीं करना चाहता तो यहां इकाई का विदेशी कंपनी का दर्जा बरकरार रखते हुए भारत में संपर्क, परियोजना या शाखा कार्यालय खोल सकता है। आमतौर पर यह भी उम्मीद की जाती है कि एफडीआई निवेशक का दीर्घावधि निवेश होगा। इसमें उनका वित्त के अलावा दूसरी तरह का भी योगदान होगा। किसी विदेशी कंपनी द्वारा भारत स्थित किसी कंपनी में अपनी शाखा, प्रतिनिधि कार्यालय या सहायक कंपनी द्वारा निवेश करने को प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) कहते हैं।
कितना बड़ा है भारतीय रिटेल बाज़ार?
अनुमानों के मुताबिक भारत का रीटेल या खुदरा बाज़ार 400 से 500 अरब डॉलर का है। अभी तक इस बाज़ार पर आधिपत्य असंगठित क्षेत्र का ही है। भारत के रिटेल क्षेत्र के सटीक आंकड़ों के उपलब्ध न होने के सबसे बड़े कारणों में से यह एक मुख्य कारण है। यह मुख्यतया दवा, संगीत, पुस्तकें, टीवी फ़्रिज जैसे उपभोक्ता उत्पाद, कपड़े, रत्न और गहने के अलावा खाद्य सामग्रियों को अलग-अलग बाजारों में वर्गीकृत किया जा सकता है। लगभग हर बाज़ार में संगठित क्षेत्र की कंपनियाँ पैठ बनाने की कोशिश कर रही हैं। दवा के क्षेत्र में रेलिगेयर, अपोलो फ़ार्मेसीज़ और गार्डियन की तरह की कई श्रृंखलाएँ बाज़ार में अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रही हैं। इसी तरह से संगीत का बाज़ार भी पूरी तरह से असंगठित क्षेत्र के हाथों में हैं। इस बाज़ार की सबसे बड़ी समस्या नक़ल है। भिन्न-भिन्न बाज़ारों को एक छत के नीचे लाने की कोशिश कई भारतीय कंपनियों ने की है लेकिन अभी तक किसी ने बाज़ार का नक़्शा बदलने में सफलता नहीं पाई है।
भारत में मल्टीब्रांड रिटेल
भारत में मल्टीब्रांड रिटेल के क्षेत्र में पिछले कुछ सालों से निजी कंपनियां चल रही हैं। अभी तक के अनुमानों के मुताबिक क़रीब 90 फ़ीसदी बाज़ार पर छोटे व्यापारियों का कब्ज़ा है। भारतीय मल्टीब्रांड रिटेल में बड़े खिलाड़ी कई हैं। टाटा- बिरला जैसे समूहों के बड़े प्रयासों के बावजूद असंगठित क्षेत्र का कब्ज़ा बाज़ार पर बरक़रार है। पेंटालून रिटेल सबसे बड़े मल्टीब्रांड व्यापारियों में से एक है। बिग बाज़ार के नाम से चलने वाली विशाल दुकानों के साथ यह कंपनी संगठित बाज़ार में सबसे ऊपर है। फ़्यूचर समूह जो पेंटालून रिटेल का मालिक है, वह कपड़ों, जूतों सहित कई और बाज़ारों में भी मज़बूत खिलाड़ी है। इस समूह की देश भर में क़रीब 500 से ऊपर छोटी-बड़ी दुकानें हैं। दुनिया की सबसे बड़ी रिटेल कंपनियों में से एक फ़्रांस की कारफ़ोर से फ़्यूचर समूह के तार जोड़कर देखे जाते हैं। इस क्षेत्र में दूसरा सबसे बड़ा समूह है रिलायंस रिटेल। मुकेश अंबानी समूह की यह कंपनी भारत में छोटे-बड़े क़रीब एक हज़ार स्टोर चलाती है। रिलायंस मार्ट से लेकर, रिलायंस फ़्रेश और रिलायंस फ़ुटप्रिंट की तरह की कई दुकाने इस समूह द्वारा चलाई जाती हैं। के रहेजा समूह की शॉपर्स स्टॉप, क्रॉसवर्ड, हायपर सिटी की नामों से कई तरह की रिटेल दुकानें चलती हैं. कुल मिलाकर टाटा, आदित्य बिरला समूह से लेकर आरपीजी, भारती और महिन्द्रा तक भारत के सभी बड़े औद्योगिक समूह रीटेल के क्षेत्र में किसी न किसी तरह से अपनी मौजूदगी रखते हैं।
असंगठित खुदरा उद्योग
भारत का संगठित खुदरा व्यापार फ़िलहाल बहुत छोटा है– कुल व्यापार का दस फ़ीसदी से भी कम वहीं नब्बे फ़ीसदी से ज़्यादा खुदरा उद्योग असंगठित है। ‘द इकॉनॉमिस्ट अख़बार’ के मुताबिक चीन का संगठित खुदरा व्यापार, कुल व्यापार का 20 फ़ीसदी और अमरीका का संगठित खुदरा व्यापार कुल व्यापार का 80 फ़ीसदी है। साथ ही ये ध्यान रखना ज़रूरी है कि भारत में आने वाले वर्षों में आबादी का ज़्यादा हिस्सा युवा है यानि उपभोक्ता वर्ग। ज़ाहिर है भारत के खुदरा बाज़ार के नए अवसरों का फ़ायदा उठाने की टक्कर होगी तो कांटे की ही। यानि ऐसे ही छोटे व्यापारियों से बना. तो ख़रीदार का मन क्या इतनी जल्दी पाला बदल लेगा? देश के तमाम बड़े और मध्यम-वर्गीय शहरों में रिहायशी इलाकों के पास छोटी दुकानों में घी-तेल, दूध-ब्रेड, दाल-आटा, बिस्कुट-नमकीन, शैम्पू-टूथपेस्ट जैसी तमाम चीज़ें मिलती हैं. किराने की एक छोटी दुकान- काउंटर के उस पार ज़रूरी नहीं कि सामान करीने से लगा हो लेकिन अक़्सर जो नहीं भी दिख रहा होगा, माँगने पर मिल जाएगा
सरकार का दावा और सच्चाई
सरकार का दावा है कि प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) से खुदरा क्षेत्र में एक करोड़ नई नौकरियां आएंगी। उपभोक्ताओं और किसानों को लाभ होगा। किसानों को अपने उत्पाद का बेहतर मूल्य मिलेगा और उन्हें अतिरिक्त रोजगार के अवसरों से भी लाभ होगा जिसके चलते उनके जीवनस्तर में सुधार होगा। केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के अनुसार, यह सिर्फ मिथक है कि बहुब्रांड खुदरा में एफडीआई से रोजगार समाप्त हो जाएंगे। एक आकलन के मुताबिक भारत में खुदरा अर्थव्यवस्था करीब 400 अरब अमेरिका डॉलर का है। इसमें 1. 2 करोड़ खुदरा व्यापारी करीब 4 करोड़ लोगों को रोजगार दिए हुए हैं। वॉल-मार्ट का टर्नओवर 420 अरब अमेरिकी डॉलर का है लेकिन इस कंपनी ने सिर्फ 21 लाख लोगों को रोजगार दिया है। खुदरा बाज़ार में विदेशी निवेश के विरोधियों का कहना है कि अगर वॉल-मार्ट जैसी कंपनी इतने कम लोगों के दम पर उतना ही कारोबार कर रही है, जितना की भारत का कुल खुदरा बाज़ार है तो उस कंपनी से क्या उम्मीद की जा सकती है। एफडीआई के विरोधी पूछते हैं कि क्या ऐसी कंपनी से 4-5 करोड़ लोगों को रोज़गार देने की उम्मीद की जा सकती है?
अमेरिका में उलटबांसी
केंद्र सरकार का दावा है कि एफडीआई भारत के कृषि क्षेत्र के लिए 'वरदान' साबित होगा। लेकिन कृषि विशेषज्ञों के मुताबिक यह सच नहीं है। उनका कहना है कि खुदरा बाज़ार में विदेशी निवेश के सबसे बड़े पैरोकार अमेरिका में भी खुदरा बाज़ार में विदेशी निवेश किसानों और कृषि क्षेत्र के लिए अच्छा साबित नहीं हुआ है। अमेरिका में फेडरल सरकार की मदद की वजह से वहां के किसान फायदे में रहते हैं। 2008 में आए फार्म बिल में अमेरिका ने अगले 5 सालों के लिए कृषि क्षेत्र के लिए 307 अरब अमेरिकी डॉलर का प्रावधान किया गया था। ऐसे में सवाल उठता है कि अगर खुदरा में एफडीआई या बड़ी पूंजी लगाने से किसानों को बडा़ फायदा होता तो अमेरिकी सरकार को अपने किसानों को इतनी भारी भरकम सब्सिडी क्यों देनी पड़ती? पश्चिमी देशों में किसानों को कई तरह की सब्सिडी के बावजूद एक स्टडी में यह बात सामने आई है कि यूरोप में हर मिनट एक किसान खेती बाड़ी का काम छोड़ रहा है।
सही प्रबंधन है इलाज
यह सही है कि भारत में आर्थिक हालात बिगड़े हुए हैं, लेकिन उसका इलाज विदेशी निवेश नहीं, अर्थव्यवस्था का सही प्रबंधन है। हम देख रहे हैं कि देश का विदेशी व्यापार घाटा लगातार बढ़ता जा रहा है। वर्ष 2010-11 में विदेशी व्यापार घाटा 130 अरब डॉलर था, जबकि अनिवासी भारतीयों द्वारा भेजी जाने वाली विदेशी मुद्रा और सॉफ्टवेयर बीपीओ निर्यात इत्यादि से प्राप्तियां कुल 86 अरब डॉलर की थीं। इस भुगतान शेष को विदेशी निवेश से पाटा गया। सरकार द्वारा विदेशी निवेश के लिए जो सबसे बड़ा तर्क दिया जाता है, वह है हमारे बढ़ते भुगतान शेष को पाटने की मजबूरी। कच्चा तेल और कुछ अन्य प्रकार के आयात करना देश की मजबूरी हो सकती है। लेकिन वर्ष 2011-12 में व्यापार घाटे में अभूतपूर्व वृद्धि देखने में आई, जबकि हमारा व्यापार घाटा बढ़कर 190 अरब डॉलर तक पहुंच गया। इतना बड़ा व्यापार घाटा पाटने के लिए विदेशी निवेश भी अपर्याप्त रहा और इसका असर यह हुआ कि देश में विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव आ गया। इसका सीधा-सीधा असर रुपये के मूल्य पर पड़ा और रुपया फरवरी 2012 में 48.7 रुपये प्रति डॉलर से कमजोर होता हुआ जुलाई माह तक 57 रुपये प्रति डॉलर के आसपास पहुंच गया। रुपये के अवमूल्यन के कारण देश में कच्चे माल की कीमतें और ईंधन की कीमतें बढ़ने लगीं। उद्योग, जो पहले से ही ऊंची ब्याज दरों के कारण लागतों में वृद्धि का दंश झेल रहा था, को अब कच्चे माल और ईधन के लिए भी ऊंची कीमतें चुकानी पड़ रही हैं। औद्योगिक उत्पादन की वृद्धि दर घटते-घटते ऋणात्मक तक पहुंच गयी और वर्ष 2011-12 की अंतिम तिमाही में यह 5.3 प्रतिशत पहुंच गई। औद्योगिक क्षेत्र न केवल बढ़ती लागतों के कारण प्रभावित हुआ, बल्कि देश में स्थायी उपभोक्ता वस्तुओं जैसे- कार, इलेक्ट्रानिक्स और यहां तक कि घरों की मांग भी घटने लगी। भारी महंगाई के चलते रिजर्व बैंक ब्याज दरों को घटाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है। आर्थिक जगत में यह चिंता व्याप्त हो गई है कि कहीं भारत की आर्थिक संवृद्धि की गाथा में लंबा विघ्न न आ जाए।
ऐसे में सरकार अपनी कमजोरियों और कुप्रबंधन को छुपाने के लिए सारा दोष राजनीतिक परिस्थितियों को दे रही है और खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश खोलने और नए विधेयकों को पारित करने को ही समाधान बता रही है। लेकिन अर्थव्यवस्था की दुर्दशा इन नई नीतियों के रुकने से नहीं है, बल्कि सरकार के बेहद चिंताजनक कुप्रबंधन के कारण है।
ये हैं फायदे
किसानों को फायदा
देश में किसानों की हालत किसी से छुपी नहीं है। उनकी तंगहाली का आलम यह है कि पिछले कुछ सालों में हजारों किसानों ने खेती में घाटे के चलते आत्महत्या का रास्ता अपनाया। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का तर्क है कि रिटेल में एफडीआई से किसानों को सीधा फायदा होगा। जानकार बताते हैं कि ब्राजील और अर्जेंटीना ने जब से रिटेल सेक्टर में एफडीआई की इजाजत दी है, तब से किसानों को मिलने वाले आर्थिक फायदे में 37 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है।
उपभोक्ता को सस्ते में मिलेगी चीजें
एफडीआई के समर्थक दक्षिण अमेरिकी देशों-ब्राजील और अर्जेंटीना का उदाहरण देकर यह कहते हैं कि उन देशों में रिटेल में एफडीआई की इजाजत के बाद करीब सभी चीजों के दाम करीब 18 फीसदी गिरे हैं।
बिचौलिए से छुटकारा
बाज़ार में सबसे ज्यादा फायदा बिचौलिए उठाते हैं। न तो किसी भी माल का उत्पादन करने वाले किसान और न ही वस्तु के अंतिम खरीदार (ग्राहक) को ही इसमें कोई फायदा होता है। बिचौलिए बेहद सस्ती दरों पर किसानों से उनके उत्पाद लेकर ग्राहकों को दूनी या कई बार तीन गुनी कीमत पर बेचते हैं। एफडीआई के समर्थक जानकारों का दावा है कि एफडीआई के आने से बिचौलिए गायब हो जाएंगे, जिससे किसानों को पहले से कहीं अधिक दाम मिलेगा और ग्राहकों को भी पहले की तुलना में काफी सस्ती चीजें मिल जाएंगी।
गांवों को सीधा फायदा
एफडीआई के समर्थकों का दावा है कि विदेशी पूंजी आने से एक बड़ा फायदा यह भी होगा कि इससे गांवों के विकास में विदेशी पूंजी लगेगी। कुछ जानकारों का दावा है कि भारत में खुदरा बाज़ार में उतरने के लिए किसी भी विदेशी निवेशक को 100 अरब अमेरिकी डॉलर का निवेश करना होगा। इस राशि में से 50 फीसदी यानी 100 अरब अमेरिकी डॉलर में से 50 अरब अमेरिकी डॉलर उन जगहों पर खर्च करना होगा, जहां से कंपनियां माल खरीदेंगी।
... और ये नुकसान
दाम में कमी नहीं
बडी़ खुदरा दुकानें बाज़ार पर धीरे-धीरे एकाधिकार बना लेती हैं। एकाधिकार के बाद यही कंपनियां मनमानी दरों पर अपने उत्पाद बेचती हैं। एफडीआई का विरोध कर रहे जानकारों का दावा है कि अफ्रीका और एशिया में कुछ सुपरमार्केट में वस्तुओं के दाम खुले बाज़ार से 20 से 30 फीसदी से ज़्यादा पाए गए।
अनाज को सड़ने से नहीं बचाएंगी कंपनियां
एफडीआई के समर्थकों का कहना है कि खुदरा बाज़ार में निवेश करने वाली विदेशी कंपनियां वैज्ञानिक ढंग से लाखों टन अनाज को सड़ने से बचाने के लिए पर्याप्त इंतजाम करेंगी। लेकिन खुदरा क्षेत्र में एफडीआई के विरोधी पूछते हैं कि दुनिया के किस देश में ऐसी बड़ी कंपनियां किसानों के अनाज को सड़ने से बचाने के लिए भंडारण की सुविधा दे रही हैं? गौर करने वाली बात यह है कि सरकार ने भंडारण (स्टोरेज) के क्षेत्र में एफडीआई की इजाजत पहले ही दे रखी है। लेकिन अब तक इस क्षेत्र में कोई विदेशी निवेश नहीं हुआ है।
नए तरह के बिचौलिए आएंगे सामने
खुदरा बाज़ार में विदेशी निवेश के समर्थकों का कहना है कि इससे बाजा़र में सबसे ज़्यादा फायदे में रहने वाले बिचौलिए गायब हो जाएंगे क्योंकि खुदरा की विदेशी दुकानें किसानों से उनके उत्पाद सीधे तौर पर खरीदेंगे और इससे किसानों को काफी फायदा होगा। लेकिन कृषि विशेषज्ञ डॉ. देविंदर शर्मा का कहना है कि यह धारणा गलत है। उन्होंने अमेरिका में हुए एक अध्ययन का हवाला देते हुए कहा है कि 20 वीं सदी की शुरुआत में अमेरिका के किसानों को लागत निकालने के बाद करीब 70 फीसदी की कमाई होती थी। लेकिन 2005 में यह फायदा गिरकर 4 फीसदी पर आ गया। ऐसे में किसानों को कहां फायदा हो रहा है। ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि खुदरा की बड़ी दुकानें अपने साथ नए तरह के बिचौलिए लेकर आती हैं। एफडीआई के बाद क्वॉलिटी कंट्रोलर, स्टैंडर्डाइजर, सर्टिफिकेशन एजेंसी, प्रॉसेसर और पैकेजिंग कंसलटेंट के रूप में नए बिचौलिए सामने आएंगे।
क्यों विरोध
- लगता है इससे छोटे दुकानदारों का धंधा ठप हो जाएगा और किसानों को उनकी उपज का वाजिब मूल्य नहीं मिलेगा।
- बड़ी विदेशी कंपनियां बाजार का विस्तार नहीं करेंगी बल्कि मौजूदा बाजार पर ही काबिज हो जाएंगी। ऐसे में खुदरा बाजार से जुड़े 4 करोड़ लोगों पर इसका असर पड़ेगा।
-विदेशी कंपनियां अपने बाजार से ही सामान खरीदेंगी और ऐसे में घरेलू बाजार से नौकरी छिनेगी।
-इस मसले पर भारत और चीन की तुलना गलत है। चीन विदेशी कंपनियों का सबसे बड़ा सप्लायर है और भारत में रिटेल में एफडीआई होने पर चीन का ही सामान यहां बिकेगा।
-जिस सप्लाई चेन के बनने की बात सरकार खुद कर रही है वो काम भी उसी का है। अगर सरकार सप्लाई चेन दुरस्त कर दे तो किसानों को इसका फायदा बिना एफडीआई के ही मिलने लगेगा।
समर्थन में तर्क
-एफडीआई से अगले तीन साल में रिटेल सेक्टर में एक करोड़ नई नौकरियां मिलेंगी।
-किसानों को बिचौलियों से मुक्ति मिलेगी और अपने सामान की सही कीमत भी।
-कंज्यूमर को क्या फायदा– लोगों को कम दामों पर विश्व स्तर की चीजें उपलब्ध होंगी।
-छोटे दुकानदारों को नुकसान या फायदा– छोटे दुकानदार को कोई खास फर्क नहीं पड़ेगा क्योंकि बड़ी कंपनियों और छोटे दुकानदारों के कारोबार करने का तरीका अलग-अलग है।
-विदेशी कंपनियां सप्लाई चेन सुधारेंगी तो खाद्य सामग्री का खराब होना थमेगा।
-सामान कम खराब होगा तो इससे खाद्य महंगाई भी सुधरेगी।
-विदेशी कंपनियों को कम से कम 30 फीसदी सामान भारतीय बाजार से ही लेना होगा। इससे देश में नई तकनीक आएगी। लोगों की आय बढ़ेगी और इसका फायदा औद्योगिक विकास दर को मिलेगा।
- देश की बड़ी कंपनियों को पहले ही रिटेल में आने की इजाजत है। चीन हो या फिर इंडोनेशिया जहां भी रिटेल में एफडीआई को मंजूरी दी गई वहां एग्रो-प्रोसेसिंग इंडस्ट्री के दिन फिर गए।
भारत में मौजूद बड़े खिलाड़ी
वॉलमार्ट: वॉलमार्ट स्टोर एक अमेरिकी पब्लिक कारपोरेशन है। इसकी स्थापना १९६२ में सैम वाल्टन ने की थी। यह अमेरिका एवं मेक्सिको का सबसे बड़ा निज़ी नियोजक है। यह कंपनी भारत के भारती समूह के साथ मिलकर छह बड़ी दुकानें चलाती है। इन दुकानों में किसानों से सामान लेकर थोक विक्रेताओं को बेचा जाता है। वॉल-मार्ट का टर्नओवर 446 अरब अमेरिकी डॉलर का है।
टेस्को: ब्रिटेन की सबसे बड़ी रीटेल कंपनी टेस्को भारत में टाटा समूह की रिटेल कंपनी ट्रेंट के साथ मिल कर काम करती है।
मेट्रो: जर्मनी की रिटेल कंपनी मेट्रो एजी भारत में छह थोक दुकानें चलाती है।
कारफोर: फ़्रांस की यह कंपनी दिल्ली में दो थोक दुकानें चला रही है।
बढ़ती जनसंख्या का संकट
दुनिया की जनसंख्या तेजी से बढ़ रही है। भारत तो इससे सबसे ज्याद प्रभावित देशों की कतार में है। अनुमान है कि देश की जनसंख्या वर्ष 2016 तक 1.26 अरब तक बढ़ जाएगी। अनुमानित जनसंख्या का संकेत है कि 2050 तक भारत दुनिया में सबसे अधिक आबादी वाला देश होगा और चीन का स्थान दूसरा होगा। दुनिया के कुल क्षेत्रफल का 2.4% परन्तु विश्व की जनसंख्या का 18% धारण कर भारत का अपने प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव काफी बढ़ गया है। कई क्षेत्रों पर पानी की कमी, मिट्टी का कटाव और कमी, वनों की कटाई, वायु और जल प्रदूषण के कारण बुरा असर पड़ रहा है। भारत की जल आपूर्ति और स्वच्छता सम्बंधित मुद्दे पर्यावरण से संबंधित कई समस्याओं से जुड़े हैं। तेजी से बढ़ती जनसंख्या और इसी के नतीजतन, आर्थिक विकास के कारण भारत में कई बड़ी पर्यावरणीय समस्याएं उत्पन्न हो रही हैं। समस्या पर प्रकाश डालती अनिल दीक्षित की रिपोर्टः-
सबसे तेज जनसंख्या वृद्धि
दुनिया की जनसंख्या और शहरीकरण के रुझान पर हाल में जारी संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार दुनिया में सबसे अधिक आबादी भारत में बढ़ रही है और सबसे अधिक शहरीकरण भी यहीं हो रहा है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि 2025 तक भारत में एक करोड़ से अधिक आबादी वाले शहरों की संख्या छह हो जाएगी। ये शहर होंगे- दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, बेंगलुरु, चेन्नई और हैदराबाद। इनमें दिल्ली तीन करोड़ 29 लाख के आंकड़े के साथ टोक्यो के बाद दुनिया का दूसरा सर्वाधिक आबादी वाला शहर होगा। मुंबई दो करोड़ 66 लाख के साथ चौथा और कोलकाता एक करोड़ 87 लाख के साथ दुनिया का 12 वां सबसे बड़ा शहर होगा। बेंगलुरु की आबादी एक करोड़ 32 लाख, चेन्नई की एक करोड़ 28 लाख और हैदराबाद की एक करोड़ 16 लाख हो जाएगी। दुनिया में इनका स्थान 23 वां, 25 वां और 31 वां होगा। रिपोर्ट के अनुसार, 2025 तक दुनिया की शहरी आबादी में 72 प्रतिशत वृद्धि होगी तथा यह वर्तमान तीन अरब 60 करोड़ से बढ़कर छह अरब 30 करोड़ हो जाएगी। कई देशों में शहरी इलाकों में बच्चों का लिंगानुपात कम हुआ है और लड़कों के मुकाबले लड़कियों की संख्या में कमी आई है।
वर्ष 2060 में अधिकतम जनसंख्या
जनसंख्या पर संयुक्त राष्ट्र के आर्थिक और सामाजिक विभाग की ओर से दुनिया के जनसांख्यिकी संबंधी अनुमान के आधार पर तैयार ताज़ा रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष 2060 में भारत की आबादी अपने सबसे अधिकतम स्तर पर पहुँच जाएगी। इसके बाद गिरावट का दौर शुरू हो जाएगा। रिपोर्ट के अनुसार चीन की जनसंख्या वर्ष 2030 में अपने अधिकतम स्तर को छू लेगी. तब चीन की आबादी एक अरब 39 करोड़ होगी। फिर अफ्रीका के देशों की आबादी में तेज़ी से बढ़ोत्तरी का दौर शुरू होगा। रिपोर्ट के आंकड़े दुनिया भर में योजनाओं की तैयारी में इस्तेमाल किए जाते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक़ वर्ष 2050 में दुनिया की आबादी नौ अरब 31 करोड़ तक पहुँच जाएगी। ये आंकड़ा वर्ष 2008 में जारी किए गए आंकड़े के मुक़ाबले क़रीब डेढ़ अरब ज़्यादा है। सदी के अंत तक विश्व की आबादी 10 अरब से भी अधिक होगी।
आबादी दर में गिरावट
दुनिया की आबादी को पांच अरब से छह अरब तक पहुंचने में 11 वर्षों का समय लगा था, लेकिन इसमें एक अरब और लोग जुड़ने में 13 वर्ष लग गए। संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक 31 अक्तूबर 2011 को दुनिया की आबादी ने सात अरब का आंकड़ा पार किया। इसकी एक बड़ी वजह दुनियाभर में प्रजनन स्तर और मृत्यु दर में गिरावट है। ये चलन विकसित देशों में ही नहीं बल्कि दक्षिण एशिया और लातिन अमेरिकी देशों में भी देखा गया है। अरब देशों को छोड़ दें तो एशिया प्रशान्त देशों में भी जनसंख्या में वृद्धि की दर क़रीब एक फीसदी है। लेकिन अफ़्रीकी देशों में ये चिंता का विषय है, वहां ये दर क़रीब ढाई फीसदी है। ये देश सबसे कम विकसित हैं और यहां आबादी सबसे तेज़ी से बढ़ रही है.संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष के मुताबिक आने वाले 40 वर्षों में जो आबादी बढ़ेगी वो ज़्यादातर शहरों में ही रहेगी, लेकिन मौजूदा हालात में शहरों में इस बढ़ोत्तरी को समाने की क्षमता नहीं है।
भारत में अधिक युवा
वर्तमान में चीन, अफ़्रीका और विकसित देशों की तुलना में भारत में कहीं अधिक युवा लोग हैं इसके आधार पर समझा जाता है कि भारत में आबादी की औसत उम्र 25 साल है। देश की आबादी के आंकड़ों पर नजर डालें तो पता चलता है कि देश में नवजात से 14 साल के बच्चों की आबादी 31.1 प्रतिशत, 15 से 64 वर्ष तक 63.6 और 65 से ऊपर के लोगों की तादात 5.3 प्रतिशत है। युवाओं की संख्या ही तेज की असली शक्ति कही जाती है। सिद्ध होता है कि आर्थिक नीतियों से विकास की तेज रफ्तार पकड़ चुके चीन की तुलना में हमारे पास भी अच्छी खासी युवा शक्ति है, फिर भी हम विकासशील देश का दर्जा हाल-फिलहाल विकसित देश में बदलने में सक्षम नहीं लग रहे। समाजशास्त्रियों के मुताबिक, युवा जनसंख्या को मानव संसाधन के रूप में ढालकर आर्थिक विकास का घटक बनाया जा सकता है। एक ताजा अध्ययन के मुताबिक भारत की श्रम शक्ति नई वैश्विक जरूरतों के मुताबिक तैयार हो जाए तो वह भविष्य में एक ऐसी पूंजी साबित होगी, जिसकी मांग दुनिया के हर देश में होगी।
बुनियादी सुविधाएं दयनीय
जनसंख्या बढ़ने के साथ ही जीविकोपार्जन के संसाधनों में लोगों की हिस्सेदारी बढ़ने लगी है। पर्यावरण पर दबाव बहुत बढ़ गया है। शहरों में जनस्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाएं दयनीय स्थिति में हैं। प्रतिदिन निकलने वाले कूड़े-करकट को हटाने और ठिकाने लगाने की व्यवस्था नहीं है। बिजली-पानी की भारी कमी, खराब सड़कें, जमीन और जल का गहरा प्रदूषण, बेकाबू बीमारियां, ट्रैफिक जाम, घटिया जल-मल निकास व्यवस्था, लूटपाट, भीड़-भाड़ और संकरी गलियां भारतीय शहरों का अभिन्न अंग बन गई हैं। जनसंख्या संबंधी भिन्नता, असंगठित शहरीकरण और बढ़ता सामाजिक-आर्थिक असंतुलन इस तरह के अपराधों को पनपने के लिए उर्वर भूमि उपलब्ध कराते हैं। कहा जा रहा है कि अपराध बढ़ रहे हैं, उन्हें अंजाम देने वाले एकदम नए चेहरे हैं। यानी चेन खींचने, अपहरण और हत्याओं को अंजाम देने वाले इन अपराधियों ने पहली बार इस दिशा में कदम बढ़ाया है। इन नए तरह के अपराधियों की पीढ़ी जो सामने आई है, उससे इस बात का खुलासा होता है कि अपराधों को अंजाम दे रहे लोग या तो वह हैं जो आधुनिक जीवन की जरुरतों के साथ ताल से ताल मिलाने की होड़ के बुरी तरह शिकार हैं या फिर ऐसे लोग हैं जो मौजूदा अंसतुलित विकास और संसाधनों के कुछ लोगों तक ही सीमित रहने का दंश झेल रहे हैं। अकेले राजधानी दिल्ली की बात करें तो यहां पिछले साल की अपेक्षा इस साल 15 जुलाई तक अपराधों में जो इजाफा हुआ, उसमें योगदान उन लोगों का ज्यादा था जो पुलिस फाइलों में अपराधी के रूप में अब तक दर्ज नहीं थे। सीनियर सिटीजन और अधिक असुरक्षित हुए हैं।
आबादी क्षेत्रों का बेतरतीब विस्तार
बढ़ती जनसंख्या की वजह से शहर और गांव-देहात के आबादी क्षेत्रों में बेतरतीब विस्तार हो रहा है। नेशनल कमेटी फॉर डेवलपमेंट इन रूरल एण्ड अर्बन एरियाज़ की रिपोर्ट के अनुसार, जिस विकास का बखान किया जा रहा है वह काफी हद तक संतुलित नहीं है। हालांकि एक वर्ग शहरीकरण को देश के लिए एक असाधारण वरदान का नाम देता है। इतिहास गवाह है कि जिन देशों में शहरों की प्रगति ज्यादा होती है , वहां आर्थिक अवसरों की उपलब्धता उतनी ही अधिक होती है। शहर किसी भी राष्ट्र के विकास के आधार स्तंभ होते हैं। जैसे-जैसे शहरों का विकास होता है, वैसे-वैसे नया बाजार तैयार होता है। प्रतिभाएं बढि़या शहरों में ही टिक सकती हैं। एक ऐसे समय में , जब दुनिया के सारे देश शहरीकरण से उत्पन्न होने वाली चुनौतियों का सामना करने एवं अपने शहरों को वैश्विक लाभ के लिए सजाने-संवारने की योजनाएं बना रहे हैं , भारत के शहरों को भी संवारना आवश्यक हो गया है। भारत के लिए शहरीकरण की चुनौतियों के बीच विकास की भारी संभावनाएं हैं। हमें देश में नई वैश्विक जरूरतों के परिप्रेक्ष्य में शहरों में विकास की मूलभूत संरचना, मानव संसाधन के बेहतर उपयोग , जीवन की सुविधाओं तथा सुरक्षा कसौटियों के लिए सुनियोजित प्रयास करने की जरूरत है। देश के ज्यादातर शहरों में नवीनीकरण और वर्तमान व्यवस्थाओं में बुनियादी बदलाव लाने की जरूरत है। हमें कुछ चमकते हुए शहरों को ही नियोजित शहर बनाने की बजाय छोटे-बड़े सभी शहरों के विकास पर ध्यान देना होगा। नई वैश्विक जरूरतों की पूर्ति करने वाले शहरों के विकास की दृष्टि से भारत के लिए यह एक अच्छा संयोग है कि अभी देश में ज्यादातर शहरी ढांचे का निर्माण बाकी है और शहरीकरण की चुनौतियों के लिए देश के पास शहरी मॉडल को परिवर्तित करने और बेहतर सोच के साथ शहरों के विकास का पर्याप्त समय अभी मौजूद है।
सर्वाधिक मलिन बस्तियां
भारत में जनसंख्या, खासकर शहरी जनसंख्या तेजी से बढ़ने के कारण आर्थिक-सामाजिक चुनौतियां भी बढ़ रही हैं। दुनिया की कुल आबादी में भारत की हिस्सेदारी 17.5 फीसदी हो गई है जबकि पृथ्वी के कुल धरातल का मात्र 2.4 फीसदी हिस्सा ही भारत के पास है। अभी 121 करोड़ आबादी के साथ भारत 134 करोड़ की सर्वाधिक जनसंख्या वाले चीन के काफी करीब पहुंच गया है। देश के शहरों में तेजी से बढ़ती जनसंख्या का संसाधनों पर जबरदस्त दबाव पड़ रहा है। वस्तुत: दुनिया के दूसरे देशों की तुलना में भारतीय शहर कहीं ज्यादा चिंताजनक स्थिति में हैं। इसका सबसे सीधा असर आवास समस्या के रूप में दिखाई पड़ रहा है। शहरों में मकानों की कमी के कारण मलिन बस्तियां वर्ष-प्रतिवर्ष तेजी से बढ़ती जा रही हैं। दुनिया की सबसे अधिक मलिन बस्तियां भारत में हैं और ये शहरी भारत के लगभग चार फीसदी हिस्से पर बनी हुई हैं। इन बस्तियों में लोग कदम-कदम पर ढेर सारी कठिनाइयों का सामना करने और नारकीय जीवन जीने के लिए विवश हैं। यही नहीं, यह बस्तियां अपराध जैसी बुराइयों को बढ़ावा भी दे रही हैं।
पेट्रोल
क्या होता है पेट्रोल
पेट्रोल या गैसोलीन एक पेट्रोलियम से प्राप्त तरल-मिश्रण है। इसे प्राथमिकता से अन्तर्दहन इंजन में बतौर ईंधन और एसीटोन की तरह एक शक्तिशाली घुलनशील द्रव्य की तरह प्रयोग किया जाता है। इसमें कई एलिफैटिक हाइड्रोकार्बन होते हैं, जिसके संग आइसो-आक्टेन या एरोमैटिक हाइड्रोकार्बन जैसे टॉलुईन और बेंजीन भी मिलाए जाते हैं, जिससे इसकी ऑक्टेन क्षमता (ऊर्जा) बढ़ जाये। इसका वाष्पदहन तापमान शून्य से 62 डिग्री (सेल्सियस) कम होता है, यानि सामान्य तापमान पर इसका वाष्प दहनशील होता है। इसी वजह से इसे अत्यंत दहनशील पदार्थों की श्रेणी में रखा जाता है। कई ठण्डे देशों में इसको प्राथमिकता से प्रयोग में लाया जाता है क्योंकि बहुत कम तापमान में इसकी ज्वलनशीलता बाक़ी ईंधनों के मुकाबले अधिक होती है। सामान्य तापमान पर इसका घनत्व 740 किलो प्रति घनमीटर होता है जो पानी (1000) से हल्का है।
अर्थशास्त्रियों और वकीलों से अटी पड़ी कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए सरकार पेट्रोल को अमीरों का ईंधन मान बैठी है। हकीकत यह है कि देश के साठ फीसदी से ज्यादा दुपहिया-तिपहिया वाहनों की बिक्री छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों में होती है। महानगरों में निम्न मध्यवर्ग ही पेट्रोल का सबसे बड़ा उपभोक्ता है। जापान की होंडा मोटर्स दुनियाभर में पेट्रोल कारों के लिए जानी जाती है मगर भारत में डीजल कारें भी बनाती है क्योंकि हमारी सरकार ने लक्जरी डीजल कारों को खैरात बांटने की शपथ ले रखी है।
एक और विडंबना देखिए। भारत के 90 फीसदी तेल कारोबार पर सरकारी कंपनियों का नियंत्रण है और सरकार की मानें तो ये कंपनियां जनता को सस्ता तेल बेचने के कारण भारी घाटे में हैं। दूसरी ओर, फॉच्र्यून पत्रिका के मुताबिक दुनिया की आला 500 कंपनियों में भारत की तीनों सरकारी तेल कंपनियां- इंडियन ऑयल (98), भारत पेट्रोलियम (271) और हिंदुस्तान पेट्रोलियम (335)- शामिल हैं। तेल और गैस उत्खनन से जुड़ी दूसरी सरकारी कंपनी ओएनजीसी भी फॉच्र्यून 500 में 360वीं रैंक पर है। आखिर यह कैसे संभव है कि सरकार घाटे का दावा कर रही है लेकिन तेल कंपनियां की बैलेंसशीट खासी दुरुस्त है। दरअसल भारत में रोजाना 34 लाख बैरल ( एक बैरल में 159 लीटर) तेल की खपत होती है और इसमें से 27 लाख बैरल तेल आयात किया जाता है। आयात किए गए कच्चे तेल को साफ करने के लिए रिफाइनरी में भेज दिया जाता है। तेल विपणन कंपनियों के कच्चा तेल खरीदने के समय और रिफाइनरी से ग्राहकों को मिलने वाले तेल के बीच की अवधि में तेल की कीमतें ऊपर-नीचे होती हैं। यहीं असली पेंच आता है। फिलहाल अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल 110 डॉलर प्रति बैरल है और अंडररिकवरी हमेशा मौजूदा कीमतों के आधार पर तय की जाती है। विडंबना देखिए, सरकार 120 डॉलर प्रति बैरल के पुराने भाव से अंडररिकवरी की गणना करके भारी-भरकम आंकड़ों से जनता को छलती है।
तेल विपणन कंपनियों का कथित घाटा भी आंकड़ों की हेराफेरी है। सकल रिफाइनिंग मार्जिन (जीआरएम) इसका सबूत है। कच्चे व शोधित तेल की कीमत के बीच के फर्क को रिफाइनिंग मार्जिन कहा जाता है और भारत की तीनों सरकारी तेल विपणन कंपनियों का जीआरएम दुनिया में सबसे ज्यादा है। चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में तेल विपणन कंपनियों का जीआरएम चार डॉलर से सात डॉलर के बीच रहा है। चीन भी भारत की तरह तेल का बड़ा आयातक देश है जबकि अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के मुताबिक चीन का रिफाइनिंग मार्जिन प्रति बैरल शून्य से 2.73 डॉलर नीचे है। यूरोप में तेल भारत से महंगा है लेकिन वहां भी जीआरएम महज 0.8 सेंट प्रति बैरल है। दुनिया में खनिज तेल के सबसे बड़े उपभोक्ता अमेरिका में रिफाइनिंग मार्जिन 0.9 सेंट प्रति बैरल है। अमेरिका और यूरोप में तेल की कीमतें पूरी तरह विनियंत्रित हैं और बाजार भाव के आधार पर तय की जाती हैं। अंडररिकवरी की पोल खोलने वाला दूसरा सबूत शेयर पर मिलने वाला प्रतिफल यानी रिटर्न ऑन इक्विटी (आरओई) है। आरओई के जरिए शेयरहोल्डरों को मिलने वाले मुनाफे का पता चलता है। भारतीय रिफाइनरियों का औसत आरओई 13 फीसदी है, जो ब्रिटिश पेट्रोलियम (बीपी) के 18 फीसदी से कम है। अगर हकीकत में अंडररिकवरी होती तो मार्जिन नकारात्मक होता और आरओई का वजूद ही नहीं होता। जाहिर है, भारत में तेल विपणन मुनाफे का सौदा है और भारतीय ग्राहक दुनिया में सबसे ऊंची कीमतों पर तेल खरीदते हैं।
महंगे तेल की एक और वजह है। हमारे देश में केंद्र सरकार और राज्य सरकारों ने तेल विपणन को खजाना भरने का जरिया बना लिया है। पेट्रोल पर तो करों का बोझ इतना है कि ग्राहक से इसकी दोगुनी कीमत वसूली जाती है। ताजा बढ़ोतरी के बाद दिल्ली में पेट्रोल की कीमत 73.14 रुपए है और जबकि तेल विपणन कंपनियों के सारे खर्चों को जोड़कर पेट्रोल की प्रति लीटर लागत 30 रुपए के आस-पास ठहरती है। केंद्र सरकार जहां कस्टम ड्यूटी के रूप में साढ़े सात फीसदी लेती है वहीं एडिशनल कस्टम ड्यूटी के मद में दो रुपए प्रति लीटर, काउंटरवेलिंग ड्यूटी के रूप में साढ़े छह रुपए प्रति लीटर, स्पेशल एडिशनल ड्यूटी के मद में छह रुपए प्रति लीटर, सेनवेट के मद में 6.35 रुपए प्रति लीटर, एडिशनल एक्साइज ड्यूटी दो रुपए प्रति लीटर और स्पेशल एडिशनल एक्साइज ड्यूटी के मद में छह रुपए प्रति लीटर लेती है। राज्य सरकारें भी वैट, सरचार्ज, सेस और इंट्री टैक्स के मार्फत तेल में तड़का लगाती हैं। दिल्ली में पेट्रोल पर 20 फीसदी वैट है जबकि मध्य प्रदेश में 28.75 फीसदी, राजस्थान में 28 फीसदी और छत्तीसगढ़ में 22 फीसदी है। मध्य प्रदेश सरकार एक फीसदी इंट्री टैक्स लेती है और राजस्थान में वैट के अलावा 50 पैसे प्रति लीटर सेस लिया जाता है।
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भारत दुनिया का अकेला ऐसा देश हैं जहां सरकार की भ्रामक नीतियों के कारण विमान में इस्तेमाल होने वाला एयर टरबाइन फ्यूल यानी एटीएफ, पेट्रोल से सस्ता है। दिल्ली में पेट्रोल और एटीएफ की कीमतों में तीन रुपए का फर्क है और नागपुर जैसे शहरों में तो एटीएफ, पेट्रोल से 15 रुपए तक सस्ता है। एटीएफ और पेट्रोल की कीमतों के बीच यह अंतर काउंटरवेलिंग शुल्क और मूल सेनवैट शुल्क की अलग-अलग दरों के कारण है। सरकार सब्सिडी खत्म करने का भी तर्क देती है। सब्सिडी को अर्थशास्त्र गरीब मानव संसाधन में किया गया निवेश मानता है लेकिन हमारी सरकार इस सब्सिडी को रोककर तेल कंपनियों का खजाना भरना चाहती है।
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आज जब कच्चे तेल की अंतर्राष्ट्रीय कीमत अगस्त 2008 की कीमत से भी कम है, फिर किस तर्क पर सरकार ने इसके मूल्य में साढ़े सात रुपए की बढ़ोतरी कर दी, यह समझ से परे है। दैनिक भास्कर डॉट कॉम के कैलकुलेशन के अनुसार, फिलहाल पेट्रोल का बेसिक प्राइस 42 रुपए निकलता है जिसके बाद केंद्र और राज्य सरकारें उसमें अपने 35-40 रुपए टैक्स और ड्यूटीज जोड़ती हैं, जिसके कारण दाम 82 रुपए तक हो जाता है। आज कच्चा तेल 100 डॉलर प्रति बैरल के हिसाब से मिल रहा है। एक डॉलर 56 रुपए के बराबर है तो एक बैरल का दाम हुआ 5600 रुपए हुआ। यह अगस्त 2008 की तुलना में 6 प्रतिशत सस्ता है। उस समय यह 5900 रुपए प्रति बैरल मिल रहा था। इसके बावजूद सरकार ने तेल कंपनियों को 7.5 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी करने से रोका नहीं।
एक बैरल में लगभग 150 लीटर कच्चा तेल आता है। इस एक बैरल तेल को रिफाइन कर पेट्रोल में बदलने का कुल खर्च 672 रुपए निकलता है। इस तरह से पेट्रोल का दाम 42 रुपए प्रति लीटर से भी कम हुआ। (5600+672/150= 41.81)।
इसका दाम बढ़कर 77-81 रुपए हो जाता है क्योंकि इसमें बेसिक एक्साइज ड्यूटीज सहित अन्य ड्यूटीज और सेस के साथ स्टेट सेल्स टैक्स भी जोड़ा जाता है। इससे 42 रुपए में 35-40 रुपए और जुड़कर इसका दाम उतना हो जाता है। इस तरह से केंद्र और राज्य दोनों मिलकर आम जनता की भलाई के नाम पर पैसा उगाहने के लिए उन्हीं के जेब पर बोझ बढ़ाते हैं।
दुनिया को रफ्तार देने के लिए कच्च तेल एक बहुत बड़ा जरिया बन चुका है। इस जरिए पर दुनिया के चंद देशों की हुकूमत ही चलती है। इन देशों के तेल देने से मना करते ही करीब आधी दुनिया ठप हो जाएगी। हम बात कर रहे हैं ऐसे देशों की, जो तेल के बेताज बादशाह हैं। पूरी दुनिया तेल को लेकर इन्हीं देशों पर पूरी तरह से निर्भर है, फिर चाहे वो भारत हो या अमेरिका। आज हम आपको बताने जा रहे हैं कि तेल पर हुकूमत करने वाले किन देशों में कच्चे तेल का कितना भंडार है? देखें-
वेनुज़वेला के पास 296,500,000,000 बिलियन बैरल का आइल रिज़र्व है। वेनुज़वेला यूनाइटेड स्टेजिस स्टेट को सबसे ज्यादा आइल सप्लाई करता है। वेनुज़वेला यूनाइटिड स्टेट को एक दिन में 1.4 मिलियन बैरल तेल निर्यात करता है।
इरान के पास 150,600,000,000 बिलियन बैरल तेल का रिज़र्व है। इरान का प्रोडक्शन 1074 में सबसे अधिक था जब वह एक दिन में 60 लाख बैरल तेल एक दिन में उत्पादित करता था।
कनाडा के पास 175,200,000,000 बिलियन का रिज़र्व है। कनाडा का 99 प्रतिशत तेल यूनाइटिड स्टेट्स को निर्यात किया जाता है। कनाडा ही वह देश है जो यूनाइटिड स्टेट को सबसे अधिक तेल निर्यात करता है।
साउदी अरेबिया का आइल रिजर्व 264,600,000,000 बिलियन बैरल का है। विश्व के पूरे आइल रिज़र्व का पांचवा हिस्सा सिर्फ साउदी अरेबिया के पास है। साउदी अरेबिया के पास गैस और आइल की 100 बड़ी गैस फील्ड हैं। साउदी अरब के कुल तेल का आधा उत्पादन तो सिर्फ 8 बड़े फील्ड में ही हो जाता है। इन फील्ड में दुनिया की सबसे बड़ी फील्ड घ्वार फील्ड भी शामिल है
इराक के पास 143,500,000,000 का आइल रिज़र्व है। इराक चल रहे लगातार युद्धों के कारण 2001 के बाद से ऑफिशियल आंकड़े प्राप्त नहीं हुए हैं। इराक में मॉर्डनाइज़ेशन और इंवेस्टमेंट की जरूरत है।
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पेट्रोल का दाम बढ़ाने के जो तर्क दिए जाते रहे हैं, उसकी हकीकत भी समझिए।
पब्लिक सेक्टर के तेल कंपनियों की हानि की पूर्ति करना-
सच यह है कि सरकार ज्यादा रकम टैक्स के रूप में रख लेती है और तेल कंपनियां अपनी रिफाइनिंग कैपेसिटी बढ़ाने के लिए नया निवेश नहीं कर पाती हैं। तेल के नए रिसोर्स की खोज भी वह नहीं कर पातीं। अन्य इंवेस्टर्स भी असुरक्षित महसूस कर अपने हाथ पीछे खींच लेते हैं। इन सबके चलते तेल के स्रोतों का धनी भारत पीछे रह जाता है और इनके मुकाबले सिंगापुर और इंडोनेशिया जैसे देश अपनी रिफाइनरी कैपेसिटी में आगे निकल जाते हैं।
रुपए का तेजी से अवमूल्यन
पिछले महीनों में रुपए का दस प्रतिशत अवमूल्यन करने से 51 रुपए का डॉलर 56 रुपए का हो गया। वहीं तेल भी तो 120 डॉलर प्रति बैरल से घटकर 100 डॉलर हो गया। इसलिए, रुपए के अवमूल्यन को कारण बनाकर पेट्रोल का दाम बढ़ाने वाली बात सही नहीं लगती।
सब्सिडी का रोना
इस बार पेट्रोल का दाम बढ़ाने से पहले भी सरकार 42 रुपए का पेट्रोल 70 रुपए में बेच रही थी। कल के दाम बढ़ोतरी के बाद तो बेसिक पेट्रोल प्राइस पर सरकार और 83 प्रतिशत टैक्स ले रही है। फिर कैसी सब्सिडी? अब इससे ज्यादा और कितना बोझ सरकार आम आदमी पर डालेगी। सरकार तो डीजल तक पर सब्सिडी नहीं दे रही है। सब्सि़डी के नाम पर 44-46 रुपए में एक लीटर डीजल मिल रहा है जबकि रिफाइनिंग से लेकर सारे कॉस्ट मिलाकर इसका दाम 42 रुपए प्रति लीटर आता है।
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दुनिया में एक देश ऐसा भी है जहां पेट्रोल पानी से भी सस्ता मिलता है। दुनिया में सबसे सस्ता पेट्रोल वेनेजुएला के काराकस में मिलता है। काराकस में 1 लीटर पेट्रोल की कीमत 3 रुपये से भी कम है। यहां लोगों को हर लीटर पेट्रोल के लिए 2.49 पैसे चुकाने होते हैं। यहां की 90 फीसदी से ज्यादा की अर्थव्यवस्था केवल तेल पर ही टिकी हुई है। इस देश में पेट्रोल नदियों में पानी की तरह हर जगह बहता है। हालांकि यहां के लोगों को पानी के लिए पेट्रोल से भी ज्यादा कीमत चुकानी होती है। दिलचस्प है कि 1980 में काराकस सरकार ने पेट्रोल की कीमते बढ़ाने के प्रयास किये थे। इस प्रयास के चलते यहां भारी दंगा मच गया था, जिसमें सैंकड़ों लोगों की मौत भी हो गई थी।
दुनिया में दूसरे नंबर पर सबसे सस्ता तेल रियाद में मिलता है। यहां पर लोगों को प्रति लीटर तेल के लिए 6.70 रुपये चुकाने होते हैं। यहां भी काराकस की तरह पानी के लिए पेट्रोल से ज्यादा पैसा चुकाना होता है।
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अमेरिकी सीनेट की सशस्त्र सेना समिति के अध्यक्ष कार्ल लेविन ने कहा है विवादास्पद परमाणु कार्यक्रमों को ईरान पर हवाई हमले किए जाने से पहले विश्व समुदाय को ईरान के तेल निर्यातों की समुद्री घेराबंदी करनी चाहिए। लेविस ने एक टीवी चैनल के लिए रिकार्ड किए गए कार्यक्रम में कहा 'मुझे लगता है कि संयुक्त राष्ट्र की व्यवस्थाओं के अनुकूल ईरान के परमाणु कार्यक्रमों को सीमित करने का उस पर दबाव बढ़ाने के लिए यह कदम जरूरी है।' इस बीच अमेरिकी विदेश मंत्नी हिलेरी क्लिंटन ने कहा कि ईरान पर दबाव बढ़ाने के लिए उस पर लगाए गए आर्थिक प्रतिबंधों के कड़ाई से पालन के लिए उत्तर कोरिया जैसे देशों से लगातार बातचीत हो रही है और इस दिशा में अच्छी प्रगति हुई है।
जेनरिक दवाइयां
जेनरिक दवाएं क्या हैं, और इनकी कीमत कम क्यों होती है।
क्या होती है जेनरिक दवाइयां?
जेनरिक दवाइयों के सन्दर्भ में जिनरिक (फार्माकोपियल) शब्द का अर्थ दवा के मूल घटक से है। उस मूल घटक से ही प्रजाति विशेष जो दवाएं तैयार होती हैं उन्हें जेनरिक या प्रजातिगत दवा कहते हैं। उदाहरण के तौर पर बाजार में गेहूँ का जो आटा 15 रुपए किलो बिकता है, उसे हम जेनरिक दवा मान लेते हैं। अब अगर यही आटा कोई आदमी या कम्पनी अपने मार्के के साथ 40 रुपए किलो के हिसाब से बेचे तो उसे कहेंगे एथिकल दवा। कोई भी निर्माता एक उत्पाद को जेनरिक या ब्रान्ड नाम से बेच सकता है। चूकिं ब्रान्ड पर निर्माता का एकाधिकार होता है तथा वह अपने ब्राण्ड को प्रसिद्ध और प्रचार-प्रसार करने के लिए खूब सारा खर्चा करता है। वह बिचौलियों यानी दवा विक्रेताओं, अपने विक्रय प्रतिनिधियों और डॉक्टरों को कमिशन देता है। इस वजह से ब्रान्डिड दवाएं जेनरिक से बहुत मंहगी हो जाती है, हालांकि दोनों की गुणवत्ता समान ही होती है।
सरकार का आग्रह जेनरिक पर क्यों?
अधिकांश दवाइयों की निर्माण लागत बहुत कम होती है, लेकिन वे विभिन्न कारणों से रोगियों को कम दामों पर नहीं मिल पाती हैं, जैसे- चिकित्सक किसी दवा कम्पनी के ब्रान्ड नाम की दवा लिखते हैं, इससे प्रतिस्पर्धा हतोत्साहित होती है और बाजार में कृत्रिम एकाधिकार की स्थिति बनती है, जिसमें दवा कम्पनी द्वारा अधिकतम खुदरा मूल्य काफी ज्यादा रखा जाता है। एक बार फिर वही उदाहरण कि डॉक्टर आपसे कहे कि गेहूँ का आटा खाओ, तो आप कहीं से भी खरीदकर खा लेंगे, अब अगर वही डॉक्टर आपसे कहे कि नत्थू की चक्की से लेकर गेहूँ का आटा खाओ, तो आपकी मजबूरी है कि जिस भाव नत्थू आटा बेचे उसी भाव खरीदना पड़ेगा। यही वजह है कि सरकार का आग्रह है कि डॉक्टर दवा का जेनरिक नाम लिखें। यानी डॉक्टर गेहूँ का आटा ही लिखें, किसी विशेष चक्की का आटा न लिखें।
क्यों मंहगी हैं एथिकल दवा?
भारत में अधिकतर दवाइयां 'औषधि मूल्य नियंत्रण' से मुक्त होने के कारण निर्माता अपनी ब्रान्डिड दवाइयों पर अधिकतम खुदरा मूल्य बहुत ज्यादा लिखते हैं। औषधि विक्रेता वही कीमत मरीज से वसूल करता है। उपभोक्ताओं को यह बात मालूम ही नहीं है कि अधिकांश दवाइयों की उत्पादन लागत बहुत कम होती है। इसके अलावा यदि चिकित्सक ने किसी ब्रांड विशेष की दवा लिख दी तो फिर मरीज के पास उसे खरीदने के अलावा और कोई विकल्प नहीं होता, भले ही बाजार में वही घटक दवा कम कीमत पर उपलब्ध हो। दूसरी वजह हमारी मानसिकता है। हम यह मान कर चलते हैं कि अगर दोनों प्रकार की दवाओं के मूल्य में इतना अंतर है तो मंहगी दवा में जरूर कोई न कोई विशेषता होगी। दवा निर्माता कम्पनियां इसी भ्रम का फायदा उठाती हैं। उदाहरण के लिए एलर्जी या जुकाम के लिए एक दवा है सिट्रिजिन। कुछ कम्पनियां एलडे या सिटेन के नाम उसकी एक गोली को 5 से 6 रुपए में बेचती हैं, जबकि यही गोली अपने मूल नाम से मात्र 18 से 20 पैसे में उपलब्ध है।
क्यों होती है ये दवाइयां सस्ती?
किसी भी ब्रान्डिड या मौलिक दवा को बनाने में होने वाले शोध पर विशेष ज्ञान, समय तथा पूंजी लगती है, तब जाकर किसी कंपनी को एक दवा का एकाधिकार (पेटेंट)मिलता है। इन सब खर्चों के बाद कंपनी का मुनाफा और उस दवा को बेचने के लिए डॉक्टरों पर होने वाला खर्च भी कीमतों को बढ़ाता है। दूसरी और जेनरिक दवाइयों पर केवल इनके निर्माण का ही खर्च होता है, इसलिए इनकी कीमत अपेक्षाकृत बहुत ही कम होती है।
कुछ अड़चनें भी आईं
सन 1990 में जब जेनरिक दवाओं को खुला बाजार मिला तो कई बड़ी ब्रान्डिड कंपनियों ने पेटेंट और कॉपीराइट जैसे मुद्दों को उठाया और इन दवाओं को रोकने के कई प्रयास किए। दूसरे, ब्रान्डिड दवाओं से कुछ डॉक्टरों के कमीशन और कंपनियों के हित सीधे जुड़े होते हैं इसलिए खुदरा विक्रेता के पास मौजूद होने के बावजूद भी डॉक्टर दवा का जेनरिक नाम नहीं लिखते, इसलिए दवा विक्रेताओं ने इन्हें रखना कम कर दिया।
कितनी सस्ती कितनी मंहगी?
अब जेनरिक दवाइयों की कीमतों में हो रहे बड़े घालमेल पर भी एक नजर डाल लेते हैं। हालांकि मौलिक और जेनरिक दवा की कीमतों में बहुत बड़ा अंतर होता है, पर जेनरिक दवा के थोक और खुदरा मूल्य के बीच का अंतर भी अविश्वनीय है। जेनरिक दवाइयां गुणवत्ता के सभी मापदण्डों में ब्रान्डिड दवाइयों के समान तथा उतनी ही असरकारक होती है। जेनरिक दवाइयों को बाजार में उतारने का लाइसेंस मिलने से पहले गुणवत्ता मानकों की सभी सख्त प्रक्रियाओं से गुजरना होता है। दवा खरीदते समय यह ध्यान आपको रखना है कि जेनरिक दवा भी किसी नामी और अच्छी कम्पनी की हो, वरना बाजार नकली और घटिया दवाइयों से भरा पड़ा है। सलाह यह दी जाती है कि जेनरिक दवा हमेशा सरकारी दुकानों से ही खरीदें, बाजार में यह दवा आपको सस्ती नहीं मिलेगी। उदाहरण के लिए जेनरिक दवा सिट्रिजिन की 10 गोली का एक पत्ता सरकारी दुकान पर 2 से ढाई रुपए का मिलता है जबकि बाजार में यह 24 से 26 रुपए का मिलेगा।
Monday, September 5, 2011
यूं करें इंटरव्यू की तैयारी
इंटरव्यू यानि साक्षात्कार, किसी नौकरी को पाने के लिए इसे पास करना एक अहम और अनिवार्य चरण है। किसी भी परीक्षा में अभ्यर्थियों का एक बड़ा प्रतिशत ऐसा होता है जो लिखित परीक्षा तो उत्तीर्ण कर लेता है लेकिन साक्षात्कार पास नहीं कर पाता। जिस क्षेत्र में नौकरी पाना चाहते है, उसकी आपको अच्छी जानकारी है और आप इंटेलीजेंट भी हैं। फिर भी नौकरी हासिल करने के लिए आपको लंबी प्रक्रिया से तो गुजरना ही पड़ेगा, जिसमें स्क्रीनिंग, ग्रुप डिस्कशन और अंत में फाइनल इंटरव्यू का सामना करना पड़ता है। इनका सामना करने से पहले आपको अपनी शैक्षिक योग्यता के साथ-साथ कई अन्य स्तरों पर भी खुद को तैयार करना होगा जिससे आपको इंटरव्यू के दौरान किसी भी तरह के व्यवधान के बिना सफलता मिल सके। केरल के सेवायोजन विभाग के आंकड़े बताते हैं कि साक्षात्कार में अनुत्तीर्ण अभ्यर्थियों का प्रतिशत बढ़ा है। उन मामलों में जहां इंटरव्यू चयन प्रक्रिया का अंतिम चरण है, वहां कंपनियां रिक्त पदों की तुलना में तीन गुना तक अभ्यर्थियों को बुलावा देने लगी हैं। पहले यह संख्या अधिकतम तक डेढ़ गुना तक हुआ करती थी। विशेषज्ञों के अनुसार, कामयाबी के लिए इंटरव्यू जहां पहली बाधा है तो प्रेजेंटेशन इसका दूसरा चरण है इसलिए इंटरव्यू की पुख्ता तैयारी अहम है। साक्षात्कार के लिए आपके मार्गदर्शन के क्रम में प्रस्तुत हैं कुछ टिप्स।
रखें याद
जिस कंपनी में आप साक्षात्कार देने जा रहे है, सबसे पहले उसके बारे में पूरी जानकारी हासिल कर लें। उसका विवरण अपने पास रखें।
जिस पद के लिए आप इंटरव्यू देने जा रहे हैं, उस विषय में जानकारियां हों।
अपनी भाषा और बातचीत के लहजे पर ध्यान दें।
साक्षात्कार से पहले अपने बायोडाटा (सीवी) पर आखिरी नजर जरूर डाल लें और इस बात से सुनिश्चित हो लें कि वह अपडेट है।
अपने आत्मविश्वास को किसी भी कीमत पर कम न होने दें। अक्सर स्टूडेंट्स इंटरव्यू के समय अपनी सोच निगेटिव बना लेते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि प्रतिभा होने के बावजूद इंटरव्यू के दबाव में बिखर जाते हैं। अपनी सोच को सकारात्मक रखें।
आपको लगता है कि आप बहुत जल्द नर्वस हो जाते है तो उसके भी उपाय है। शीशे के सामने खड़े होकर भी इंटरव्यू की प्रैक्टिस कर सकते है। इससे आपको खुद को परखने का मौका भी मिलेगा, साथ ही आत्मविश्वास भी।
आत्मविश्लेषण करना भी जरूरी है। इससे आप खुद की स्ट्रेंथ और वीकनेस, स्किल्स और टैलेंट को पहचानने में सफल होंगे। साथ ही साथ आप अपनी उपलब्धियों और करियर के लक्ष्य को भी स्पष्ट कर सकते है।
इंटरव्यू के एजेंडा का पूर्वानुमान लगाना भी इंटरव्यू की तैयारी के लिए बेहतर विकल्प है। पूर्वानुमानित प्रश्नों की सूची बनाएं और उनके उत्तर देने की कोशिश करें।
इंटरव्यू के दिन घटित घटनाओं को ध्यान में रखें। आपसे पूछा जा सकता है कि आपने कार्यालय के जिस द्वार से प्रवेश किया, रिसेप्शन काउंटर उससे किस दिशा में था। सीढ़ियां किस दिशा में थीं और काउंटर पर आपका स्वागत करने वाले कर्मचारी की नेम प्लेट पर क्या नाम लिखा था।
सवाल जितना पूछा जाए, उतना ही जवाब दें। जिस सवाल का जवाब न जानते हों, साफ-साफ बता दें कि मैं नहीं जानता। इससे उनको पता चल जाएगा कि आप एक ईमानदार व खुद की क्षमताएं पहचानने वाले व्यक्ति हैं।
बैंकिंग जॉब से संबंधित इंटरव्यू में उम्मीदवारों को पर्सनालिटी से लेकर बैंकिंग और इकॉनोमी से संबंधित ज्ञान की परख की जाती है।
वित्तीय क्षेत्र में इंटरव्यू के लिए बेहतर होगा कि आप करेंट अफेयर्स के साथ ही रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया और अर्थव्यवस्था से संबंधित जानकारी से अपडेट रहें।
साक्षात्कार के अंत में पैनल को धन्यवाद कहना न भूलें। आतिथ्य सत्कार के व्यवसाय (होटल-रेस्टोरेंट्स चेन आदि) में इस पर विशेष ध्यान दिया जाता है कि आपने इंटरव्यू शुरू होने से पहले अभिवादन किया या नहीं और धन्यवाद कहना आप भूले तो नहीं।
साक्षात्कार में सामान्य रूप से पूछे जाने वाले प्रश्न (साक्षात्कार में कुछ प्रश्न रोजगार के अवसर की प्रकृति के अनुसार बदल जाते हैं) -
अपने विषय में बताइये?
हमारी संस्था के विषय में आप क्या जानते हैं?
क्या आप समझते हैं कि आप इस जॉब के काबिल हैं?
आप हमारे लिए ऐसा कौन सा काम कर सकते हैं जो कोई दूसरा नहीं कर सकता?
जिस जाब के लिये साक्षात्कार लिया जा रहा है, उसके लिए कौन सी योग्यताएँ आवश्यक होती हैं?
आप हमारी संस्था में क्यों काम करना चाहते हैं?
अपने नियंत्रण-प्रबंध (control management) के विषय में बताइये?
एक प्रबंधक के लिए कौन से कार्य सर्वाधिक कठिन होते हैं?
पिछले सेवायोजक आपको कैसे व्यक्ति लगते थे?
आपके पिछले जाब में आपकी कौन कौन सी उपलब्धियाँ रही हैं?
क्या इस पद को आप अपने योग्य समझते है?
आपके करियर गोल्स (career goals) क्या हैं?
यदि आपका देश के किसी अन्य स्थान में स्थानांतरण कर दिया जाए तो क्या आपको स्वीकार होगा?
आप कौन कौन सी कमजोरियां हैं?
ऐसा कौन सा प्रश्न है जिसके पूछने की आप उम्मीद कर रहे थे किन्तु पूछा नहीं गया?
क्या आप हम से कुछ प्रश्न पूछना चाहते हैं?
यदि आपको हमसे कुछ पूछने के लिए कहा जाए तो आप क्या पूछेंगे?
किसी पाठ्यक्रम में प्रवेश की प्रक्रिया के तहत पूछे जाने वाले कुछ प्रश्न-
आपने करियर बनाने के लिए यह (जिसमें प्रवेश लेना है) कोर्स ही क्यों चुना?
हमारे संस्थान के बारे में जानकारी कहां से प्राप्त हुई?
क्या विशेषताएं आपको यहां प्रवेश के लिए खींच लाईं?
कोर्स के दौरान शिक्षण की बेहतरी के यदि कोई उपाय या कमियां आपकी समझ में आती हैं तो क्या बताएंगे?
याद रहे--
बेहतर आई कॉन्टैक्ट, आत्मविश्वास से भरी बॉडी लैंग्वेज, प्रश्नों के संक्षिप्त और सटीक उत्तर, विनम्रता के साथ स्पष्ट उच्चारण आपको साक्षात्कार में उत्कृष्ट बनाएगा। साथ ही इंटरव्यू प्रारंभ होने से पहले अभिवादन और अंत में धन्यवाद देना बेहद आवश्यक है। इससे पता चलता है कि आप कितने शालीन हैं और जॉब के लिए कितने उपयुक्त हैं।
रखें याद
जिस कंपनी में आप साक्षात्कार देने जा रहे है, सबसे पहले उसके बारे में पूरी जानकारी हासिल कर लें। उसका विवरण अपने पास रखें।
जिस पद के लिए आप इंटरव्यू देने जा रहे हैं, उस विषय में जानकारियां हों।
अपनी भाषा और बातचीत के लहजे पर ध्यान दें।
साक्षात्कार से पहले अपने बायोडाटा (सीवी) पर आखिरी नजर जरूर डाल लें और इस बात से सुनिश्चित हो लें कि वह अपडेट है।
अपने आत्मविश्वास को किसी भी कीमत पर कम न होने दें। अक्सर स्टूडेंट्स इंटरव्यू के समय अपनी सोच निगेटिव बना लेते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि प्रतिभा होने के बावजूद इंटरव्यू के दबाव में बिखर जाते हैं। अपनी सोच को सकारात्मक रखें।
आपको लगता है कि आप बहुत जल्द नर्वस हो जाते है तो उसके भी उपाय है। शीशे के सामने खड़े होकर भी इंटरव्यू की प्रैक्टिस कर सकते है। इससे आपको खुद को परखने का मौका भी मिलेगा, साथ ही आत्मविश्वास भी।
आत्मविश्लेषण करना भी जरूरी है। इससे आप खुद की स्ट्रेंथ और वीकनेस, स्किल्स और टैलेंट को पहचानने में सफल होंगे। साथ ही साथ आप अपनी उपलब्धियों और करियर के लक्ष्य को भी स्पष्ट कर सकते है।
इंटरव्यू के एजेंडा का पूर्वानुमान लगाना भी इंटरव्यू की तैयारी के लिए बेहतर विकल्प है। पूर्वानुमानित प्रश्नों की सूची बनाएं और उनके उत्तर देने की कोशिश करें।
इंटरव्यू के दिन घटित घटनाओं को ध्यान में रखें। आपसे पूछा जा सकता है कि आपने कार्यालय के जिस द्वार से प्रवेश किया, रिसेप्शन काउंटर उससे किस दिशा में था। सीढ़ियां किस दिशा में थीं और काउंटर पर आपका स्वागत करने वाले कर्मचारी की नेम प्लेट पर क्या नाम लिखा था।
सवाल जितना पूछा जाए, उतना ही जवाब दें। जिस सवाल का जवाब न जानते हों, साफ-साफ बता दें कि मैं नहीं जानता। इससे उनको पता चल जाएगा कि आप एक ईमानदार व खुद की क्षमताएं पहचानने वाले व्यक्ति हैं।
बैंकिंग जॉब से संबंधित इंटरव्यू में उम्मीदवारों को पर्सनालिटी से लेकर बैंकिंग और इकॉनोमी से संबंधित ज्ञान की परख की जाती है।
वित्तीय क्षेत्र में इंटरव्यू के लिए बेहतर होगा कि आप करेंट अफेयर्स के साथ ही रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया और अर्थव्यवस्था से संबंधित जानकारी से अपडेट रहें।
साक्षात्कार के अंत में पैनल को धन्यवाद कहना न भूलें। आतिथ्य सत्कार के व्यवसाय (होटल-रेस्टोरेंट्स चेन आदि) में इस पर विशेष ध्यान दिया जाता है कि आपने इंटरव्यू शुरू होने से पहले अभिवादन किया या नहीं और धन्यवाद कहना आप भूले तो नहीं।
साक्षात्कार में सामान्य रूप से पूछे जाने वाले प्रश्न (साक्षात्कार में कुछ प्रश्न रोजगार के अवसर की प्रकृति के अनुसार बदल जाते हैं) -
अपने विषय में बताइये?
हमारी संस्था के विषय में आप क्या जानते हैं?
क्या आप समझते हैं कि आप इस जॉब के काबिल हैं?
आप हमारे लिए ऐसा कौन सा काम कर सकते हैं जो कोई दूसरा नहीं कर सकता?
जिस जाब के लिये साक्षात्कार लिया जा रहा है, उसके लिए कौन सी योग्यताएँ आवश्यक होती हैं?
आप हमारी संस्था में क्यों काम करना चाहते हैं?
अपने नियंत्रण-प्रबंध (control management) के विषय में बताइये?
एक प्रबंधक के लिए कौन से कार्य सर्वाधिक कठिन होते हैं?
पिछले सेवायोजक आपको कैसे व्यक्ति लगते थे?
आपके पिछले जाब में आपकी कौन कौन सी उपलब्धियाँ रही हैं?
क्या इस पद को आप अपने योग्य समझते है?
आपके करियर गोल्स (career goals) क्या हैं?
यदि आपका देश के किसी अन्य स्थान में स्थानांतरण कर दिया जाए तो क्या आपको स्वीकार होगा?
आप कौन कौन सी कमजोरियां हैं?
ऐसा कौन सा प्रश्न है जिसके पूछने की आप उम्मीद कर रहे थे किन्तु पूछा नहीं गया?
क्या आप हम से कुछ प्रश्न पूछना चाहते हैं?
यदि आपको हमसे कुछ पूछने के लिए कहा जाए तो आप क्या पूछेंगे?
किसी पाठ्यक्रम में प्रवेश की प्रक्रिया के तहत पूछे जाने वाले कुछ प्रश्न-
आपने करियर बनाने के लिए यह (जिसमें प्रवेश लेना है) कोर्स ही क्यों चुना?
हमारे संस्थान के बारे में जानकारी कहां से प्राप्त हुई?
क्या विशेषताएं आपको यहां प्रवेश के लिए खींच लाईं?
कोर्स के दौरान शिक्षण की बेहतरी के यदि कोई उपाय या कमियां आपकी समझ में आती हैं तो क्या बताएंगे?
याद रहे--
बेहतर आई कॉन्टैक्ट, आत्मविश्वास से भरी बॉडी लैंग्वेज, प्रश्नों के संक्षिप्त और सटीक उत्तर, विनम्रता के साथ स्पष्ट उच्चारण आपको साक्षात्कार में उत्कृष्ट बनाएगा। साथ ही इंटरव्यू प्रारंभ होने से पहले अभिवादन और अंत में धन्यवाद देना बेहद आवश्यक है। इससे पता चलता है कि आप कितने शालीन हैं और जॉब के लिए कितने उपयुक्त हैं।
Sunday, December 26, 2010
सरकोजी की यात्रा से भारत-फ्रांस में बढ़ी समझदारी
फ्रांस के राष्ट्रपति निकोलस सरकोजी चार दिवसीय यात्रा पर चार दिसम्बर को भारत आए। दशकों पुराने भारत-फ्रांस संबंधों में यह यात्रा बेहद महत्वपूर्ण पड़ाव मानी जा रही है। सरकोजी भारत यात्रा पर दूसरी बार आए। इससे पहले वह 2008 में गणतंत्र दिवस परेड के मुख्य अतिथि थे। सरकोजी और उनकी पत्नी कार्ला ब्रूनी ने अपनी यात्रा बंगलुरू से शुरु की और मुंबई पर खत्म। भारत के इन दोनों शहरों का अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर महत्व है। मुंबई आर्थिक राजधानी है और बंगलुरू को तकनीकी राजधानी कहा जाने लगा है। इस यात्रा के विभिन्न पड़ावों पर फ्रांसीसी राष्ट्रपति ने भारत के साथ सांस्कृतिक, राजनीतिक और आर्थिक संबंधों को मजबूत करने की पहल की। उनके साथ फ्रांसीसी मंत्रिमंडल के 6 मंत्री और विभिन्न कंपनियों के 70 मुख्य कार्यकारी अधिकारी शामिल थे। यात्रा का उद्देश्य-
भारत दौरे से फ्रांस यहां के व्यापार में अपनी और पकड़ बनाना चाहता था। इस तरह के विशाल शिष्टमंडल को साथ लाने का उद्देश्य आर्थिक मसलों पर आपसी विश्वास को बढ़ावा देना है। फ्रांस व भारत की वार्ताओं का मुख्य केंद्र परमाणु ऊर्जा एवं रक्षा समझौता रहा। ज्ञात हो कि भारत ने पहला परमाणु करार फ्रांस के साथ ही किया था। यह अमेररीका से हुए परमाणु करार से अधिक दूरगामी था और इसमें अमेरिकी करार की तरह शर्तें भी नहीं थोपी गयी थीं। निकोलस सरकोजी की इस यात्रा में उसी करार को आगे बढ़ाने की मंशा थी, जिसे काफी हद तक पूरा किया गया। फ्रांस से भारत के रिश्ते सदा से अच्छे रहे हैं। उस दौर में भी, जब अमेरिका समेत सारा पश्चिम हमारे खिलाफ था।
बढ़ा सहयोग-
भारत-फ्रांस के बीच परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने के लिए कुल सात समझौते हुए हैं। इनमें सबसे महत्वपूर्ण है महाराष्ट्र के जैतपुर में परमाणु बिजली संयंत्र की फ्रांसीसी सहयोग से स्थापना। फ्रांसीसी कंपनी अरेवा और भारतीय परमाणु ऊर्जा निगम लिमिटेड के बीच 25 अरब डालर का बुनियादी समझौता हुआ। यह करार सबसे महत्वपूर्ण इसलिए माना जा रहा है कि इससे भारत के परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में थमे हुए पहिए फिर रफ्तार पकड़ते नजर आएंगे। अपनी बिजली की जरूरत पूरी करने के लिए पारंपरिक जैविक ईंधन की जगह नाभिकीय ऊर्जा का इस्तेमाल करने की भारत की कोशिश इस समझौते से पूरी होगी। इन महत्वपूर्ण समझौतों के अतिरिक्त निकोलस सरकोजी ने भारत को आधुनिक रक्षा तकनीक मुहैया कराने की इच्छा जताई। रूस का विमान मिग और फ्रांस का मिराज भारतीय सेना को सशक्त बनाते रहे हैं। सरकोजी ने भारत को सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता दिलाने की मंशा जाहिर की। इससे भारत सर्वाधिक उत्साहित हुआ है। फ्रांसीसी राष्ट्रपति ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के साथ मुलाकात में पाकिस्तान और अफगानिस्तान में पनप रहे आतंकवाद पर भी चिंता जाहिर की। इनके अलावा दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक, शैक्षणिक सहयोग बढ़ाने पर भी चर्चा हुई, जिसका लाभ इस देश के प्रतिभाशाली छात्रों को मिलेगा।
परमाणु सहयोग को महत्व-
फ्रांसीसी राष्ट्रपति ने साझा संवाददाता सम्मेलन में भारत को सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता दिलाने में फ्रांसीसी सहयोग के मुद्दे को सर्वाधिक महत्व दिया, लेकिन व्यवहारतः इस यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा भारत और फ्रांस के बीच दो परमाणु रिएक्टर लगाने का सौदा ही था, जो 9.3 अरब डॉलर का है। परमाणु तकनीक में फ्रांस आगे है और जब सोवियत संघ और अमेरिका या वारसा संधि और नाटो देशों के बीच तनातनी का दौर था, तब फ्रांस शांतिपूर्ण कामों के लिए परमाणु तकनीक बेचने वाला सबसे बड़ा देश बन गया था। इधर भी अमेरिका से परमाणु करार होने और परमाणु दायित्व का मसला सुलझ जाने के बाद से ऐसे सौदों की उम्मीद की जा रही थी। भारत कुल 20 परमाणु संयंत्र लगाकर अपनी ऊर्जा की जरूरतों में आ रही कमी को पूरा करना चाहता है और फ्रांस से जो समझौता हुआ है, यह उसी का हिस्सा है। परमाणु बिजली को हमारी ऊर्जा की जरूरतों का विकल्प माना जा रहा है।
भारत-रूस में अहम सैनिक परमाणु सहयोग समझौता
रूस के राष्ट्रपति दिमित्री मेदवेमेव ने अपनी आधिकारिक भारत यात्रा 21 दिसम्बर को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मुलाकात के साथ शुरू की। इस दौरान भारत और रूस के बीच 11 समझौतों पर हस्ताक्षर किए हैं। इसमें असैनिक परमाणु सहयोग पर अहम समझौता शामिल है। रूसी राष्ट्रपति रूस के आर्थोडॉक्स चर्च के सर्वोच्च धर्मगुरु पेट्रिआर्च एलेक्सी द्वितीय के निधन के कारण तीन दिन की यात्रा बीच में छोड़कर स्वदेश लौट गए। यात्रा की मुख्य बात यह रही कि मेदवेदेव ने भी संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के विस्तार की सूरत में भारत को स्थाई सदस्य के रूप में मौका दिए जाने का समर्थन किया। उन्होंने कहा, अगर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का विस्तार होता है, तो भारत स्थाई सदस्य बनने का हकदार है। दोनों देशों के बीच ये सहमति बनी है कि 2015 तक द्विपक्षीय व्यापार को 20 अरब डॉलर किया जाएगा।ये हुए समझौते
परमाणु क्षेत्र में सहयोग के अलावा दोनों देशों के बीच तेल और गैस क्षेत्र, अंतरिक्ष, विज्ञान और तकनीक तथा फार्मा क्षेत्र में समझौतों पर हस्ताक्षर हुए हैं। अवैध अप्रवासियों को रोकने और हाइड्रोकार्बन सेक्टर में भी भारत और रूस के बीच सहमति-पत्र पर हस्ताक्षर हुए। इसके अलावा 2015 तक द्विपक्षीय व्यापार को 20 अरब डॉलर तक बढ़ाने, इनमें चुनाव के क्षेत्र में मदद, आपातकाल से ल़डने में सहायता, द्विपक्षीय विज्ञान एवं तकनीक संस्थान खोलने, सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में सूचना आदान-प्रदान करने पर समझौते हुए हैं।
दोनों देशों के नेताओं के वक्तव्य
दिल्ली में संयुक्त संवाददाता सम्मेलन में रूसी राष्ट्रपति ने कहा, भारत के साथ अफगानिस्तान मुद्दे पर भी चर्चा हुई है। कोई भी आतंकवादियों को अपने यहां आम नागरिक की तरह जगह नहीं दे सकता है और उन्हें सौपना ही चाहिए। मैं जानता हूं कि प्रत्यर्पण की प्रक्रिया जटिल होती है, इसके लिए कानूनी ढांचे की जरूरत है। ऎसा ढांचा तैयार होने के बाद आतंकवादियों को सौंप दिया जाना चाहिए, ताकि उन्हें सजा मिल सके। मेदवेदेव ने कहा कि रूस, पाकिस्तान से मांग करता है कि वह संयुक्त राज्य द्वारा आतंकी संगठनों पर लगाए गए पाबंदी को अमलीजामा पहनाए। इस मौके पर मनमोहन सिंह ने कहा कि रूस भारत का ऎसा दोस्त है, जिसने हर अच्छे-बुरे समय में भारत का साथ दिया है। उन्होंने कहा कि भारत के बाकी देशों से बढ़ते संबंधों के बावजूद रूस के साथ रिश्ता आगे बढ़ता रहेगा। भारतीय प्रधानमंत्री ने रूस-अमेरिका के बीच हुए निरस्त्रीकरण का स्वागत किया। दोनों देशों ने ईरान के शांतिपूर्ण परमाणु संवर्धन कार्यक्रम का समर्थन किया।
यात्रा के निहितार्थ-
शीत युद्ध के दौरान भारत और सोवियत संघ के करीबी रिश्ते रहे हैं और रूसी राष्ट्रपति चाहते हैं कि उनकी कंपनियां अन्य विदेशी कंपनियों से परमाणु और रक्षा सौदों में पिछ़ड न जाएं। भारत और रूस के बीच वर्ष 2009 में व्यापारिक लेन-देन साढ़े सात अरब डालर तक पहुंच गया था। वर्ष 2010 के पहले नौ महीनों में इस राशि में बीस प्रतिशत वृद्धि हुई और आशा की जा रही है वर्ष 2015 तक इसका स्तर बीस अरब डालर तक पहुंच जाएगा। दोनों देशों के बीच सबसे बड़ी संयुक्त परियोजना दक्षिणी भारत में एक परमाणु बिजलीघर का निर्माण और शाखालीन फील्ड से तेल और गैस का निकालना है जिसमें भारत की सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी शामिल है। रूस में बने हथियारों के लिए भारत पुराना बाज़ार रहा है लेकिन अब दोनों देशों के संबंध बदल रहे हैं. भारत अब सिर्फ़ रूस से हथियार नहीं खरीदना चाहता बल्कि उनकी तकनीक भी सीखना चाहता है। इसके अतिरिक्त एशिया में चीन के बढ़ते कद के मद्देनजर भी भारत अन्य शक्तिशाली देशों का समर्थन चाहता है। अमेरिकी राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा के साथ ही फ्रांसीसी राष्ट्रपति निकोलस सरकोजी और अब रूसी राष्ट्रपति के आगमन का लाभ उठाने की मंशा के पीछे यही निहितार्थ रहा है। इसके साथ ही विश्व में चीन के पश्चात भारत के आर्थिक विकास की दर सबसे ऊंची है और इस दर ने उसे अमेरिका और यूरोप की संकटग्रस्त अर्थव्यवस्था के लिए आकर्षण का केन्द्र बना दिया है।
Thursday, December 2, 2010
ओबामा की भारत यात्रा
अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अपने दस दिवसीय एशियाई दौरे की शुरुआत 6 नवम्बर को भारत दौरे से की। यात्रा का पहला दिन उन्होंने मुंबई में व्यतीत किया, जहां भारतीय व्यापार और उद्योग जगत के प्रतिनिधियों से मुलाक़ात की एवं अमेरिकी और भारतीय कंपनियों के बीच 10 अरब डॉलर के समझौतों की घोषणा की। 7 नवम्बर को दिल्ली पहुंचकर वह हुंमायूं का मक़बरा देखने गए और राजघाट में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की समाधि पर श्रद्धांजलि अर्पित की। यहां राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल से उऩकी मुलाकात हुई। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने उनके सम्मान में भोज दिया। दिल्ली में ओबामा ने प्रतिबंधित तकनीकों के निर्यात से भी पाबंदी हटाने की बात कही। इसके तहत भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) और रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) को परमाणु ईंधन के दोहरे उपयोग की तकनीक हासिल करने की सुविधा मिल सकेगी। भारतीय संसद को संबोधित करते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की स्थाई सदस्यता का समर्थन किया। उन्होंने कहा, अमेरिका चाहता है कि संयुक्त राष्ट्र में सुधार होने चाहिए और भारत को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य होना चाहिए। भारत और अमेरिका ने दोनों देशों के बीच रणनीतिक साझेदारी को बढ़ाने और मज़बूत करने की घोषणा भी की। अमेरिकी राष्ट्रपित की यात्रा पर भारत और अमेरिका ने एक संयुक्त बयान जारी कर कहा है कि 21वीं सदी में दुनिया भर में शांति क़ायम रखने के लिए एक सक्षम और प्रभावी संयुक्त राष्ट्र संघ की ज़रुरत है। समझौतों से अमेरिका में 50 हज़ार से अधिक रोज़गार अवसरों का निर्माण होगा। दोनों नेताओं ने इस बात पर ज़ोर दिया कि जो देश 21वीं सदी में नेतृत्व करना चाहते हैं, उनके लिए जरूरी है कि वे देश संयुक्त राष्ट्र के उद्देश्य यानि शांति और सुरक्षा, वैश्विक सहयोग और मानवाधिकारों के संरक्षण के लिए ज़िम्मेदारी स्वीकार करें। नेता द्वय ने पूर्वी और मध्य एशिया तथा मध्य पूर्व में भारत और अमेरिका के बीच सामरिक सहयोग को और बढ़ाने पर बल दिया। अफ़ग़ानिस्तान में भारत की भूमिका की सराहना करते हुए ओबामा ने कहा कि भारत के सहयोग से अफ़ग़ानिस्तान को आत्मनिर्भर बनने में मदद मिलेगी। भारत और अमरीका ने अफ़ग़ानिस्तान में कृषि और महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में संयुक्त परियोजना शुरु करने का फैसला किया है।
16वें एशियाई खेलों का समापन
चीन में ग्वांग्झू में 27 नवम्बर को 16वें एशियाई खेलों का समारोहपूर्वक समापन हुआ। ये अब तक के सबसे बड़े एशियाई खेल थे जहाँ 42 खेलों में 476 स्वर्ण पदकों का फ़ैसला हुआ। 17वें एशियाई खेल दक्षिण कोरिया के इंचियोन में शहर आयोजित किए जाएंगे। इन खेलों में चीन ने 199 स्वर्ण, 119 रजत और 98 काँस्य पदकों सहित कुल 416 पदक जीते। दूसरे स्थान पर रहे दक्षिण कोरिया के 76 स्वर्ण, 65 रजत और 91 कांस्य पदकों सहित कुल 232 पदक थे। जापान 48 स्वर्ण पदकों के साथ तीसरे स्थान पर रहा। भारत को 14 स्वर्ण, 17 रजत, 33 कांस्य सहित कुल 66 पदक प्राप्त हुए। वह छठवें स्थान पर रहा।
चीन ने जीते सर्वाधिक पदक
इन खेलों में 45 एशियाई देशों और क्षेत्रों के लगभग 10 हज़ार एथलीट्स ने हिस्सा लिया। पदक तालिका में 36 देशों और क्षेत्रों को जगह मिली जबकि स्वर्ण कुल मिलाकर 28 देशों और क्षेत्रों ने जीते। इनमें 1400 ड्रग टेस्ट हुए जिनमें से दो लोगों के नमूने पॉज़िटिव पाए गए। एथलेटिक्स में चीन का बोलबाला रहा जहां उसने 13 स्वर्ण सहित कुल 36 पदक जीते। दूसरे नंबर पर पांच स्वर्ण के साथ भारत रहा। बास्केटबॉल में भी चीन ने पुरुष और महिला दोनों वर्गों में स्वर्ण अपने पास बरक़रार रखा। मुक्केबाज़ी में चीन ने पांच स्वर्ण सहित कुल 10 पदक जीते जबकि भारत के पास दो स्वर्ण सहित कुल नौ पदक आए। फ़ुटबॉल में जापान ने महिलाओं और पुरुषों दोनों ही वर्गों में स्वर्ण पदक पर क़ब्ज़ा किया। हॉकी में चीन ने महिलाओं का स्वर्ण जीता। उधर कुश्ती में ईरान सबसे आगे रहा, जिसने सात स्वर्ण पदक जीते, जापान को तीन स्वर्ण मिले।
भारत का प्रदर्शन-राउंडअप
भारत को सबसे ज्यादा स्वर्ण पदक एथलेटिक्स में मिले। इसके साथ ही पिछले खेलों के मुक़ाबले मुक्केबाज़ी में भारत के प्रदर्शन में सबसे ज़बर्दस्त सुधार हुआ। टेनिस में भी भारत ने अच्छा प्रदर्शन किया और दो स्वर्ण, एक रजत और दो काँस्य पदक जीते। एथलेटिक्स के अलावा अलग अलग वर्ग के दौड़ में भी भारत ने अपना परचम लहराया। दोहा एशियाई खेलों निशानेबाज़ी (पिस्टल के मुक़ाबलों) में भारत को तीन स्वर्ण मिले थे जबकि यहां मात्र एक स्वर्ण मिला। पिछले एशियाई खेलों में सिर्फ़ दो काँस्य पदक लाने वाले मुक्केबाज़ों ने इस बार भारत को कुल नौ पदक दिलाए और उसमें भी दो स्वर्ण थे। रोइंग ने पाँच पदक दिलाए जिसमें बजरंग लाल टाखर का पुरुषों के एकल स्कल्स में स्वर्ण भी शामिल था। पंकज आडवाणी ने बिलियर्ड्स में पहला स्वर्ण भारत को दिलाया। शतरंज में देश को मात्र दो काँस्य पदकों से ही संतोष करना पड़ा। टेनिस में सोमदेव देवबर्मन ने एकल और युगल में स्वर्ण जीता। तीरंदाज़ी में भारतीय पुरुष और महिला टीमों को काँस्य पदक मिले। आशीष कुमार ने भारत को पहली बार एशियाई खेलों में काँस्य दिलाया। इसी तरह तैराकी में भारत को 24 साल बाद कोई पदक मिला। भारतीय हॉकी टीमें स्वर्ण जीतकर सीधे लंदन ओलंपिक के लिए क्वॉलिफ़ाई करने के इरादे से आई थीं मगर महिला टीम तो चौथे स्थान पर रही जबकि पुरुष टीम सेमीफ़ाइनल में मलेशिया से हार गई और बाद में काँस्य जीत सकी। कबड्डी में महिलाओं के वर्ग में स्वर्ण भारत को ही मिला। राष्ट्रमंडल खेलों में अच्छे प्रदर्शन के बाद कुश्ती से भारत को काफ़ी उम्मीदें थीं मगर अलका तोमर और सुशील कुमार जैसे प्रमुख पहलवानों की ग़ैर-मौजूदगी में भारत सिर्फ़ तीन काँस्य पदक ही जीत सका।
पदक तालिका
स्थान देश स्वर्ण रजत कांस्य कुल
1 चीन 199 119 98 416
2 दक्षिण कोरिया76 65 91 232
3 जापान 48 74 94 216
4 ईरान 20 14 25 59
5 कजाकिस्तान18 23 38 79
6 भारत 14 17 33 64
7 चीनी ताइपे 13 16 38 67
8 उज्बेकिस्तान11 22 23 56
9 थाईलैण्ड 11 9 32 52
10 मलेशिया 9 18 13 40
11 हांगकांग 8 15 17 40
12 उत्तर कोरिया6 10 20 36
13 सऊदी अरब 5 3 5 13
14 बहरीन 5 0 4 9
15 इंडोनेशिया4 9 13 26
16 सिंगापुर 4 7 6 17
17 कुवैत 4 6 1 11
18 कतर 4 5 7 16
19 फिलीपींस3 4 9 16
20 पाकिस्तान 3 2 3 8
चीन ने जीते सर्वाधिक पदक
इन खेलों में 45 एशियाई देशों और क्षेत्रों के लगभग 10 हज़ार एथलीट्स ने हिस्सा लिया। पदक तालिका में 36 देशों और क्षेत्रों को जगह मिली जबकि स्वर्ण कुल मिलाकर 28 देशों और क्षेत्रों ने जीते। इनमें 1400 ड्रग टेस्ट हुए जिनमें से दो लोगों के नमूने पॉज़िटिव पाए गए। एथलेटिक्स में चीन का बोलबाला रहा जहां उसने 13 स्वर्ण सहित कुल 36 पदक जीते। दूसरे नंबर पर पांच स्वर्ण के साथ भारत रहा। बास्केटबॉल में भी चीन ने पुरुष और महिला दोनों वर्गों में स्वर्ण अपने पास बरक़रार रखा। मुक्केबाज़ी में चीन ने पांच स्वर्ण सहित कुल 10 पदक जीते जबकि भारत के पास दो स्वर्ण सहित कुल नौ पदक आए। फ़ुटबॉल में जापान ने महिलाओं और पुरुषों दोनों ही वर्गों में स्वर्ण पदक पर क़ब्ज़ा किया। हॉकी में चीन ने महिलाओं का स्वर्ण जीता। उधर कुश्ती में ईरान सबसे आगे रहा, जिसने सात स्वर्ण पदक जीते, जापान को तीन स्वर्ण मिले।
भारत का प्रदर्शन-राउंडअप
भारत को सबसे ज्यादा स्वर्ण पदक एथलेटिक्स में मिले। इसके साथ ही पिछले खेलों के मुक़ाबले मुक्केबाज़ी में भारत के प्रदर्शन में सबसे ज़बर्दस्त सुधार हुआ। टेनिस में भी भारत ने अच्छा प्रदर्शन किया और दो स्वर्ण, एक रजत और दो काँस्य पदक जीते। एथलेटिक्स के अलावा अलग अलग वर्ग के दौड़ में भी भारत ने अपना परचम लहराया। दोहा एशियाई खेलों निशानेबाज़ी (पिस्टल के मुक़ाबलों) में भारत को तीन स्वर्ण मिले थे जबकि यहां मात्र एक स्वर्ण मिला। पिछले एशियाई खेलों में सिर्फ़ दो काँस्य पदक लाने वाले मुक्केबाज़ों ने इस बार भारत को कुल नौ पदक दिलाए और उसमें भी दो स्वर्ण थे। रोइंग ने पाँच पदक दिलाए जिसमें बजरंग लाल टाखर का पुरुषों के एकल स्कल्स में स्वर्ण भी शामिल था। पंकज आडवाणी ने बिलियर्ड्स में पहला स्वर्ण भारत को दिलाया। शतरंज में देश को मात्र दो काँस्य पदकों से ही संतोष करना पड़ा। टेनिस में सोमदेव देवबर्मन ने एकल और युगल में स्वर्ण जीता। तीरंदाज़ी में भारतीय पुरुष और महिला टीमों को काँस्य पदक मिले। आशीष कुमार ने भारत को पहली बार एशियाई खेलों में काँस्य दिलाया। इसी तरह तैराकी में भारत को 24 साल बाद कोई पदक मिला। भारतीय हॉकी टीमें स्वर्ण जीतकर सीधे लंदन ओलंपिक के लिए क्वॉलिफ़ाई करने के इरादे से आई थीं मगर महिला टीम तो चौथे स्थान पर रही जबकि पुरुष टीम सेमीफ़ाइनल में मलेशिया से हार गई और बाद में काँस्य जीत सकी। कबड्डी में महिलाओं के वर्ग में स्वर्ण भारत को ही मिला। राष्ट्रमंडल खेलों में अच्छे प्रदर्शन के बाद कुश्ती से भारत को काफ़ी उम्मीदें थीं मगर अलका तोमर और सुशील कुमार जैसे प्रमुख पहलवानों की ग़ैर-मौजूदगी में भारत सिर्फ़ तीन काँस्य पदक ही जीत सका।
पदक तालिका
स्थान देश स्वर्ण रजत कांस्य कुल
1 चीन 199 119 98 416
2 दक्षिण कोरिया76 65 91 232
3 जापान 48 74 94 216
4 ईरान 20 14 25 59
5 कजाकिस्तान18 23 38 79
6 भारत 14 17 33 64
7 चीनी ताइपे 13 16 38 67
8 उज्बेकिस्तान11 22 23 56
9 थाईलैण्ड 11 9 32 52
10 मलेशिया 9 18 13 40
11 हांगकांग 8 15 17 40
12 उत्तर कोरिया6 10 20 36
13 सऊदी अरब 5 3 5 13
14 बहरीन 5 0 4 9
15 इंडोनेशिया4 9 13 26
16 सिंगापुर 4 7 6 17
17 कुवैत 4 6 1 11
18 कतर 4 5 7 16
19 फिलीपींस3 4 9 16
20 पाकिस्तान 3 2 3 8
नवम्बर-2010 में खास खबरें
एक नवम्बर- चीन में विश्व की सबसे बड़ी जनगणना शुरू। डिल्मा चुनी गईं ब्राजील की राष्ट्रपति।
दो नवम्बर- जापान ने की रूस से राजदूत वापस बुलाने की घोषणा। लॉर्ड स्वराज पॉल ने दिया हाउस आफ लार्ड्स के डिप्टी स्पीकर पद से त्यागपत्र।
तीन नवम्बर- निकी हैले चुनी गईं अमेरिकी प्रांत दक्षिण कैरोलिना की गवर्नर। रूस के पूर्व प्रधानमंत्री विक्टर चेरनोमिरदिन का निधन।
चार नवम्बर- स्वदेशी विमान इंजन कावेरी का सफल परीक्षण। कोल इंडिया बनी भारत की पांचवीं मूल्यवान कंपनी।
पांच नवम्बर- म्यांमार में विशाल मार्च के बाद आंग सान सू की रिहाई की तैयारी में जुटी सरकार।
छह नवम्बर- अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा भारत यात्रा पर मुंबई पहुंचे। जकाया किकविते तंजानिया के दोबारा राष्ट्रपति। भारत संयुक्त राष्ट्र की महत्वपूर्ण बजट संबंध समिति में चुना गया।
सात नवम्बर- आस्ट्रेलिया ने श्रीलंका के विरुद्ध एकदिवसीय क्रिकेट सीरीज जीती। रोजर फेडरर स्वस इंडोर्स टेनिस विजेता।
आठ नवम्बर- अमेरिका और आस्ट्रेलिया में अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी पर समझौता। दक्षिण अफ्रीका ने पाकिस्तान को हराकर जीती वन-डे सीरीज।
नौ नवम्बर- उड़ीसा का नाम बदलकर ओडिशा करने को लोकसभा की मंजूरी। अमेरिका राष्ट्रपति बराक ओबामा नई दिल्ली से इंडोनेशिया रवाना।
10 नवम्बर- पृथ्वीराज चह्वाण बने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री। जी-20 सम्मेलन में भाग लेने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह सियोल रवाना।
11 नवम्बर- सचिन तेंदुलकर विश्वकप 2011 के ब्रांड अम्बेस्डर नियुक्त। पृथ्वीराज चह्वाण ने ली महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पद की शपथ।
12 नवम्बर- चीन में 16वें एशियाई खेलों का शुभारंभ। म्यांमार में आन सांग सू की को रिहा करने के आदेश।
13 नवम्बर- निशानेबाज गगन नारंग ने 16वें एशियाई खेलों में भारत का पहला पदक जीता। संयुक्त राष्ट्र की स्थाई सदस्यता पर भारत को जापान का समर्थन।
14 नवम्बर- केन्द्रीय संचार मंत्री के पद से ए. राजा का त्यागपत्र। फिलन बने फ्रांस के प्रधानमंत्री।
15 नवम्बर- नेपाल में प्रधानमंत्री पद को 17 वें दौर का चुनाव टला। जमीयत उलेमा ए हिंद ने अयोध्या मामले में की सुप्रीम कोर्ट में अपील।
16 नवम्बर- मोबाइल स्पेक्ट्रम आवंटन पर नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की रिपोर्ट संसद में पेश। इसी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मांगा प्रधानमंत्री से स्पष्टीकरण।
17 नवम्बर- एशियाई खेलों की वुशु स्पर्धा में भारत को पहली बार रजत पदक। चीन ने पेश किया दुनिया का सबसे तेज सुपर कम्प्यूटर तिहान्हे 1-ए।
18 नवम्बर- एशियाई खेलों में नौकायन में भारत को दो रजत पदक। तिब्बती धर्मगुरू दलाई लामा को मदर टेरेसा मेमोरियल इंटरनेशनल अवार्ड।
19 नवम्बर- गृहमंत्री पी. चिदम्बरम ने की राजीव गांधी नवयुवती सशक्तिकरण योजना (सबला) की शुरुआत। ब्राजील के पूर्व प्रधानमंत्री लुइस इनासियो लूला को इंदिरा गांधी शांति पुरस्कार की घोषणा।
20 नवम्बर- नाटो ने किया मिसाइल सुरक्षा प्रणाली लगाने का निर्णय। बिहार विधानसभा चुनावों में मतदान का अंतिम चरण सम्पन्न।
21 नवम्बर- भारत ने जीते एशियाई खेलों में तीन स्वर्ण पदक। तंबाकू प्रयोग पर नियंत्रण के लिए 172 देशों में बनी सहमति।
22 नवम्बर- केन्द्रीय सर्तकता आयुक्त पीजे थॉमस की नियुक्ति पर उठाया प्रश्न। मुंबई में एक और हवाई अड्डे को स्वीकृति।
23 नवम्बर- सोमदेव देवबर्मन ने जीता एशियाई टेनिस में एकल स्पर्धा का स्वर्ण। ऋण संकट से त्रस्त आयरलैंड को यूरोपीय संघ और अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष (आईएमएफ) से मिला बेलआउट पैकेज।
24 नवम्बर- बिहार विधानसभा चुनावों में सत्तारूढ़ गठबंधन को स्पष्ट बहुमत। मोबाइल नंबर पोर्टेबिलिटी सेवा की हरियाणा टेलीकॉम सक्रिल से शुरुआत।
25 नवम्बर- भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड ने आईपीएल से कोच्चि की टीम को किया बाहर। मिसाइल अग्नि-1 का परीक्षण सफल।
26 नवम्बर- सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट की कार्यशैली पर की सख्त टिप्पणियां। राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल पहुंचीं सीरिया की राजधानी दमिश्क।
27 नवम्बर- ग्वांग्झू एशियाई खेलों का समापन। बास्केटबॉल खेलते वक्त अमेरिकी राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा हुए चोटिल।
28 नवम्बर- भारत ने एक दिवसीय क्रिकेट मैच में न्यूजीलैण्ड को हराया। भारत-सीरिया ने बनाई साझा व्यापार परिषद।
29 नवम्बर- वेबसाइट विकीलीक्स ने लीक किए अमेरिकी गोपनीय दस्तावेज। राष्ट्र विरोधी टिप्पणी पर हुर्रियत नेता सैयद अली शाह गिलानी और लेखिका अरुंधति राय पर दिल्ली में मुकदमा दर्ज।
30 नवम्बर- अमर प्रताप सिंह बने केंद्रीय जांच ब्यूरो [सीबीआई] के नए निदेशक। बिहीर में नवगठित 15वीं विधानसभा का पहला सत्र आरंभ।
दो नवम्बर- जापान ने की रूस से राजदूत वापस बुलाने की घोषणा। लॉर्ड स्वराज पॉल ने दिया हाउस आफ लार्ड्स के डिप्टी स्पीकर पद से त्यागपत्र।
तीन नवम्बर- निकी हैले चुनी गईं अमेरिकी प्रांत दक्षिण कैरोलिना की गवर्नर। रूस के पूर्व प्रधानमंत्री विक्टर चेरनोमिरदिन का निधन।
चार नवम्बर- स्वदेशी विमान इंजन कावेरी का सफल परीक्षण। कोल इंडिया बनी भारत की पांचवीं मूल्यवान कंपनी।
पांच नवम्बर- म्यांमार में विशाल मार्च के बाद आंग सान सू की रिहाई की तैयारी में जुटी सरकार।
छह नवम्बर- अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा भारत यात्रा पर मुंबई पहुंचे। जकाया किकविते तंजानिया के दोबारा राष्ट्रपति। भारत संयुक्त राष्ट्र की महत्वपूर्ण बजट संबंध समिति में चुना गया।
सात नवम्बर- आस्ट्रेलिया ने श्रीलंका के विरुद्ध एकदिवसीय क्रिकेट सीरीज जीती। रोजर फेडरर स्वस इंडोर्स टेनिस विजेता।
आठ नवम्बर- अमेरिका और आस्ट्रेलिया में अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी पर समझौता। दक्षिण अफ्रीका ने पाकिस्तान को हराकर जीती वन-डे सीरीज।
नौ नवम्बर- उड़ीसा का नाम बदलकर ओडिशा करने को लोकसभा की मंजूरी। अमेरिका राष्ट्रपति बराक ओबामा नई दिल्ली से इंडोनेशिया रवाना।
10 नवम्बर- पृथ्वीराज चह्वाण बने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री। जी-20 सम्मेलन में भाग लेने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह सियोल रवाना।
11 नवम्बर- सचिन तेंदुलकर विश्वकप 2011 के ब्रांड अम्बेस्डर नियुक्त। पृथ्वीराज चह्वाण ने ली महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पद की शपथ।
12 नवम्बर- चीन में 16वें एशियाई खेलों का शुभारंभ। म्यांमार में आन सांग सू की को रिहा करने के आदेश।
13 नवम्बर- निशानेबाज गगन नारंग ने 16वें एशियाई खेलों में भारत का पहला पदक जीता। संयुक्त राष्ट्र की स्थाई सदस्यता पर भारत को जापान का समर्थन।
14 नवम्बर- केन्द्रीय संचार मंत्री के पद से ए. राजा का त्यागपत्र। फिलन बने फ्रांस के प्रधानमंत्री।
15 नवम्बर- नेपाल में प्रधानमंत्री पद को 17 वें दौर का चुनाव टला। जमीयत उलेमा ए हिंद ने अयोध्या मामले में की सुप्रीम कोर्ट में अपील।
16 नवम्बर- मोबाइल स्पेक्ट्रम आवंटन पर नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की रिपोर्ट संसद में पेश। इसी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मांगा प्रधानमंत्री से स्पष्टीकरण।
17 नवम्बर- एशियाई खेलों की वुशु स्पर्धा में भारत को पहली बार रजत पदक। चीन ने पेश किया दुनिया का सबसे तेज सुपर कम्प्यूटर तिहान्हे 1-ए।
18 नवम्बर- एशियाई खेलों में नौकायन में भारत को दो रजत पदक। तिब्बती धर्मगुरू दलाई लामा को मदर टेरेसा मेमोरियल इंटरनेशनल अवार्ड।
19 नवम्बर- गृहमंत्री पी. चिदम्बरम ने की राजीव गांधी नवयुवती सशक्तिकरण योजना (सबला) की शुरुआत। ब्राजील के पूर्व प्रधानमंत्री लुइस इनासियो लूला को इंदिरा गांधी शांति पुरस्कार की घोषणा।
20 नवम्बर- नाटो ने किया मिसाइल सुरक्षा प्रणाली लगाने का निर्णय। बिहार विधानसभा चुनावों में मतदान का अंतिम चरण सम्पन्न।
21 नवम्बर- भारत ने जीते एशियाई खेलों में तीन स्वर्ण पदक। तंबाकू प्रयोग पर नियंत्रण के लिए 172 देशों में बनी सहमति।
22 नवम्बर- केन्द्रीय सर्तकता आयुक्त पीजे थॉमस की नियुक्ति पर उठाया प्रश्न। मुंबई में एक और हवाई अड्डे को स्वीकृति।
23 नवम्बर- सोमदेव देवबर्मन ने जीता एशियाई टेनिस में एकल स्पर्धा का स्वर्ण। ऋण संकट से त्रस्त आयरलैंड को यूरोपीय संघ और अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष (आईएमएफ) से मिला बेलआउट पैकेज।
24 नवम्बर- बिहार विधानसभा चुनावों में सत्तारूढ़ गठबंधन को स्पष्ट बहुमत। मोबाइल नंबर पोर्टेबिलिटी सेवा की हरियाणा टेलीकॉम सक्रिल से शुरुआत।
25 नवम्बर- भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड ने आईपीएल से कोच्चि की टीम को किया बाहर। मिसाइल अग्नि-1 का परीक्षण सफल।
26 नवम्बर- सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट की कार्यशैली पर की सख्त टिप्पणियां। राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल पहुंचीं सीरिया की राजधानी दमिश्क।
27 नवम्बर- ग्वांग्झू एशियाई खेलों का समापन। बास्केटबॉल खेलते वक्त अमेरिकी राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा हुए चोटिल।
28 नवम्बर- भारत ने एक दिवसीय क्रिकेट मैच में न्यूजीलैण्ड को हराया। भारत-सीरिया ने बनाई साझा व्यापार परिषद।
29 नवम्बर- वेबसाइट विकीलीक्स ने लीक किए अमेरिकी गोपनीय दस्तावेज। राष्ट्र विरोधी टिप्पणी पर हुर्रियत नेता सैयद अली शाह गिलानी और लेखिका अरुंधति राय पर दिल्ली में मुकदमा दर्ज।
30 नवम्बर- अमर प्रताप सिंह बने केंद्रीय जांच ब्यूरो [सीबीआई] के नए निदेशक। बिहीर में नवगठित 15वीं विधानसभा का पहला सत्र आरंभ।
Saturday, November 20, 2010
जानिये ये हैं सुपर कम्प्यूटर...

तेज गति से दौड़ रही आज की इस दुनिया में सब-कुछ कम्प्यूटर पर केंद्रित है। इसीलिये कम्प्यूटरों की गति भी बढ़ रही है। देशों में प्रतिस्पर्धा है कि कौन कितनी तेज गति का कम्प्यूटर बनाता है। इसी होड़ में विजय पाते हुए चीन ने तिहान्हे-1 ए सुपर कम्प्यूटर का अविष्कार किया है। तिहान्हे का हिंदी में शाब्दिक अर्थ है आकाशगंगा। 18 नवम्बर को बीजिंग में इसका अनावरण किया गया। इन कंप्यूटरों की रैंकिंग निर्धारित करने वाली टेन्नसी स्थित प्रयोगशाला के वैज्ञानिक जैक जोंगरा के मुताबिक, यह कम्प्यूटर शीर्ष स्थान का हकदार है। यह वर्तमान में सर्वाधिक तेज माने जाने वाले अमेरिकी सुपर कम्प्यूटर जगुआर से 1.4 गुना अधिक है। इस श्रेणी के कम्प्यूटरों के मामले में चीन के साथ ही अमेरिका, जापान, फ्रांस और जर्मनी सबसे आगे हैं। शीर्ष-10 की सूची में अमेरिका के पांच, चीन के दो और फ्रांस, जापान और जर्मनी का एक-एक सुपर कम्प्यूटर है। भारत का सुपर कम्प्यूटर एका 47वें स्थान पर है। हमारे तीन और सुपर कम्प्यूटर शीर्ष-500 की सूची में 136, 297 और 489 वें पायदान पर हैं।
चीन ने सबसे तेज सुपर कम्प्यूटर
चीन ने अमेरिका की भांति दुनिया का सबसे तेज कम्प्यूटर बना लिया है। 14 नवम्बर को जारी एक सूची में दुनिया के 500 सुपर कम्प्यूटरों में चीन के तिहान्हे-1ए को शीर्ष स्थान दिया गया जो प्रति सेकेंड 2.67 क्वाड्रिलियंस गणनाएं कर सकता है। यह कम्प्यूटर संसार के तेज सुपर कंप्यूटर के लिए एक सर्व में सबसे तेज बताया जा रहा है। चीन से पहले अमेरिका ने सुपर कम्प्यूटर जगुआर ने बनाया था। सुपर कम्प्यूटर की रैंकिंग को निर्धारित करने वाले टेन्नेसी स्थित प्रयोगशाला के कम्प्यूटर वैज्ञानिक जैक डोंगरा ने कहा कि चीन द्वारा बनाया गया यह कम्प्यूटर शीर्ष स्थान पर रहने का हकदार है। चीन के उत्तरी तटीय शहर तियानजिन स्थित नेशनल सुपर कम्प्यूटर सेंटर में तियान्हे 1 ने प्रति सेकंड 2507 ट्रिलियन गणना करके यह मुकाम हासिल किया। इस कम्प्यूटर को नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ डिफेंस टेक्नॉलॉजी ने विकसित किया है जिसने इसे स्वदेश निर्मित फितेंग-1000 सीपीयू से सुसज्जित किया है।
क्या होता है सुपर कम्प्यूटर
यह ऐसा कम्प्यूटर है जो सामान्य कम्प्यूटरों की तुलना में काफी तेज गति से चलता है। पैरेलल प्रोसेसिंग के सिद्धांत पर काम करने वाले सुपर कम्प्यूटर 32 या 64 पैरेलल सर्किट्स में कार्यरत कई कम्प्यूटरों को जोड़कर बनाए जाते हैं। इन्हें इनकी काम करने की गति से परिभाषित किया जाता है। वर्तमान में वे कम्प्यूटर जिनकी कार्य क्षमता 500 मेगा फ्लाप्स और मेमोरी कम से कम 52 मेगा बाइट हो, सुपर कम्प्यूटर कहलाते हैं। पैरेलल प्रोसेसिंग तकनीक में जोड़े गए सारे माइक्रो प्रोसेसर किसी भी समस्या को भागों में विभाजित कर उस पर एकसाथ कार्य करते हैं। इस पूरी प्रक्रिया से गणनाओं की क्षमता पांच अरब प्रति सेकेंड सुनिश्चित हो जाती है। शुरुआती सुपर कम्प्यूटरों में वेक्टर प्रोसेसिंग का प्रयोग होता था जो अपेक्षाकृत काफी महंगी थी। वर्तमान के सुपर कम्प्यूटरों में जहां गीगा फ्लाप्स, टेरा फ्लाप्स और पेटा फ्लाप्स की गति पाई जाती है पर पुराने दौर में यह गति मेगा फ्लाप्स ही थी। इसके साथ ही सुपर कम्प्यूटरों में उच्च भण्डारण घनत्व वाली मैग्नेटिक बबल मेमोरी या आवेशित कपल्ड युक्तियों वाली मेमोरी का प्रयोग होता है, जिनकी मदद से छोटे से स्थान में सूचनाओं का बड़ा भण्डार एकत्र किया जा सकता है।
सुपर कम्प्यूटर का इतिहास
पहली बार सुपर कम्प्यूटर शब्द का प्रयोग 1929 में आईबीएम के बनाए टैबुलेटर्स के लिए हुआ था। उस समय यह आधुनिक तकनीक का प्रतिनिधित्व करते थे। अमेरिका के कंट्रोल डाटा कारपोरेशन (सीडीसी) में कार्यरत इलेक्ट्रिकल इंजीनियर सीमौर क्रे ने पहला सुपर कम्प्यूटर डिजाइन किया था। साठ के दशक से विकसित होना शुरू हुआ यह सुपर कम्प्यूटर सत्तर के दशक में प्रस्तुत हो सका। अस्सी के दशक तक इस क्षेत्र में सीडीसी का वर्चस्व रहा हालांकि सीमौर 1985-90 तक सुपर कम्प्यूटर मार्केट में छाए रहे। सीडीसी के बनाए सुपर कम्प्यूटर उस समय के सामान्य कम्प्यूटर की तुलना में महज दस गुना तेज गणना करते थे। यह क्षमता उनमें लगे तेज स्केलर प्रोसेसर्स की वजह से थी। अस्सी के दशक में ही सुपर कम्प्यूटरों में वेक्टर प्रोसेसर लगाए जाने लगे। नब्बे के दशक में चार से 16 प्रोसेसर्स समानांतर एक साथ प्रयोग किए जाने लगे। आज समानांतर डिजाइन स्टॉक में उपलब्ध सर्वर श्रेणी के माइक्रो प्रोसेसर्स पर आधारित हो गई है।
इसके उपयोग
सुपर कम्प्यूटर का सबसे अहम कार्य वैज्ञानिक कम्प्यूटिंग होता है। अत्यंत जटिल कार्यों में गणना के लिए भी इसका उपयोग हो रहा है, जैसे जलवायु शोध, क्वांटम भौतिकी, मौसम पूर्वानुमान, पॉलिमर रिसर्च, मॉलिक्यूलर मॉडेलिंग और फिजिकल सिमुलेशंस। क्वांटम मेकेनिक्स में विभिन्न आंकड़ों का विश्लेषण यह आसानी से कर देते हैं और परमाण्विक स्तर पर किसी पदार्थ का अध्ययन भी संभव है। हालांकि इसका सर्वाधिक प्रयोग मौसम पूर्वानुमान के लिए हो रहा है और दुनिया के सबसे ज्यादा सुपर कम्प्यूटर मौसम का पूर्वानुमान लगाने में ही प्रयुक्त हो रहे हैं। वैश्विक जलवायु मापने में भी यह इस्तेमाल हो रहे हैं। अंतरिक्ष कार्यक्रम भी सुपर कम्प्यूटरों पर ही आश्रित हैं। अमेरिकी अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान (नासा) के पास शक्तिशाली सुपर कम्प्यूटर है जिसका प्रयोग अंतरिक्ष मिशनों को सटीकता से पूरा करने में हो रहा है।
कहां है भारत
सुपर कम्प्यूटर के क्षेत्र में भारत को अभी बहुत-कुछ करना बाकी है। भारत के पास पांच सुपर कम्प्यूटर हैं जो सक्रियता से काम कर रहे हैं। ये कम्प्यूटर इंडियन इंस्टीट्यूट आफ ट्रॉपिकल मेट्रोलॉजी, इंडियन इंस्टीट्यूट आफ टेक्नोलॉजी (आईआईटी) कानपुर, सेंटर फॉर डेवलपमेंट आफ एडवांस कम्प्यूटिंग (सीडैक) और निजी कम्पनी ह्यूलेट पैकर्ड (एचपी) के पास हैं। एचपी के सहयोग से तीन करोड़ डॉलर की लागत से तैयार टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (टीसीएस) के एका सुपर कम्प्यूटर वर्ष 2008 में जब स्थापित किया गया था, तब उसे गति के मामले में उसे विश्व में नौवां स्थान प्राप्त हुआ था। एका की सबसे ज्यादा गति 0.172 पेटा फ्लॉप्स है। टीसीएस अब एका-प्लस बनाने में जुटा है। एका के बाद भारत ने अन्नपूर्णा सुपर कम्प्यूटर विकसित किया, जिसे चेन्नई के इंस्टीट्यूट आफ मैथमेटिकल साइंस ने बनाया था। इसकी पीक कम्प्यूटेशन स्पीड थी 12 टेराफ्लॉप। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) के बनाए पेस का मुख्य उपयोग मिसाइल और लड़ाकू विमानों की डिजाइनिंग में किया जा रहा है। भाभा परमाणु अनुसंधान संस्थान ने अनुपम नामक सुपर कम्प्यूटर विकसित किया है जबकि सीडैक के ऐसे कम्प्यूटर को परम नाम दिया गया था। 1998 में विकसित परम की गति 100 गीगा फ्लॉप्स है और यह एक सेकेंड में एक खबर गणितीय गणना करने में सक्षम है। इसके साथ ही सीडैक ने 2003 में परम पदम विकसित किया, जिसके साथ ही भारत उन देशों की पंक्ति में खड़ा हो गया जिनके पास टेरा फ्लॉप्स गणना की क्षमता वाले सुपर कम्प्यूटर हैं। तब तक अमेरिका, चीन, जापान और इजराइल के पास ऐसे सुपर कम्प्यूटर थे। सीडैक ने ही भारत का पहला कम कीमत का परम अनंत सुपर कम्प्यूटर विकसित किया है।
शुगर क्यूब साइज की तैयारी
आईबीएम की कोशिश दुनिया के सबसे छोटे सुपर कम्प्यूटर का विकास करने की है। उसके वैज्ञानिकों का दावा है कि वह अगले 10 से 15 वर्ष में शुगर क्यूब साइज का कम्प्यूटर बना लेंगे। कोशिश इसके इस्तेमाल में ऊर्जा के बेहद कम उपयोग की भी होगी। इस तकनीक को अक्वास्टार नाम दिया गया है। इस तकनीक विकास वास्तव में सुपरकम्प्यूटरों का कद कम करने के लिए नहीं बल्कि ऊर्जा की खपत को कम करने के लिए किया जा रहा है। भविष्य में कौन सा सिस्टम कितनी कम ऊर्जा का दोहन करता है यह काफी मायने रखेगा। आईबीएम के डॉ. मिशेल और उनकी टीम ने अक्वास्टार का सफल परीक्षण किया है। इस सिस्टम के अंतर्गत एक बडॆ फ्रीज के रैक में प्रोसेसरों को एक के ऊपर एक रखा गया और उनके बीच बहते पानी ने उनकी गर्मी को सोख कर सिस्टम को चालू रखा। इससे करीब 50% बिजली की बचत हुई।
Saturday, November 13, 2010
क्या है ब्ल्यू कॉर्नर नोटिस?
ब्ल्यू कॉर्नर नोटिस का मकसद इंटरपोल के सदस्य देशों से संबंधित व्यक्ति, जिसके विरुद्ध यह नोटिस जारी किया गया है, से संबंधित व्यक्तिगत और उसकी गतिविधियां आदि अन्य जानकारियां जुटाना होता है। किसी व्यक्ति को ब्लू कॉर्नर नोटिस दिए का मतलब है कि उसकी यात्राओं पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया जाना। इसे सामान्य भाषा में तलाश नोटिस कहा जाता है, हालांकि जिस देश में वह रह रहा है, वहां उसे रेड कॉर्नर नोटिस की तरह गिरफ्तार नहीं किया जाता बल्कि सामान्य रूप में संबंधित देश को पूरी सूचना दे दी जाती है। लेकिन जरूरत पड़ने पर आरोपी को वापस लाने के लिए इस नोटिस के तहत प्रत्यर्पण की प्रक्रिया भी शुरू की जा सकती है। जबकि ब्ल्यू अलर्ट का मतलब है कि उस व्यक्ति विदेश यात्रा से पहले जांच-पड़ताल या पूछताछ की जा सकती है। उसे एयरपोर्ट पर उड़ान के दौरान गिरफ्तार भी किया जा सकता है। हाल ही में चर्चा में आए इंडियन प्रीमियर क्रिकेट लीग के पूर्व चेयरमैन ललित मोदी पर फॉरेन एक्सचेंज मैनेजमेंट एक्ट के उल्लंघन का आरोप है।कौन जारी करता है यह नोटिस
इंटरपोल(Interpol) के स्तर से यह नोटिस जारी किया जाता है, जिसका पूरा नाम है International Criminal Police Organization। यह अंतर्राष्ट्रीय संस्था है जो विभिन्न देशों के पुलिस के बीच सहयोग करके अंतर्राष्ट्रीय अपराधियों को पकड़ती है। इसका मुख्यालय फ्रांस के लियोन शहर में स्थित है। यह नोटिस इंटरपोल की अधिकृत भाषा में जारी किए जाते हैं।
कौन-कौन से होते हैं नोटिस
इंटरपोल सात तरह के नोटिस जारी करती है जिनमें छह तो उनके रंगों से पहचाने जाते हैं, यह हैं रेड, ब्ल्यू, ओरेंज, येलो, ग्रीन और ब्लैक जबकि सातवें का नाम है इंटरपोल-यूएन सिक्योरिटी काउंसिल स्पेशल नोटिस। सन 2009 में इंटरपोल ने 7290 नोटिस जारी किए थे। रेड कॉर्नर नोटिस अस्थाई आग्रह होता है जिसमें व्यक्ति को प्रत्यर्पण के लिए गिरफ्तार करने को कहा जाता है। ओरेंज नोटिस पुलिस और अन्य अंतर्राष्ट्रीय संगठनों को पार्सल बम आदि विभिन्न प्रकार के खतरों से आगाह करने के लिए जारी होता है। येलो नोटिस उन लोगों की तलाश करने का आग्रह है जो विशेष रूप से कम उम्र या अपनी पहचान बता पाने में अक्षम होते हैं। ग्रीन नोटिस उन अपराधियों के बारे में चेतावनी या जानकारी के रूप में होता है जिनके अन्य देशों में भी इसी प्रकार के अपराध करने की आशंका होती है। ब्लैक नोटिस अज्ञात शवों के बारे में जानकारी प्राप्त करने के उद्देश्य से जारी होता है। इंटरपोल-संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद विशेष नोटिस आतंकवादी संगठन अल कायदा और तालिबान के संबंध में है। 2005 में सुरक्षा परिषद के विशेष आग्रह पर शुरू किए गए इस नोटिस का मकसद आतंकी खतरे के विरुद्ध समय पूर्व एकजुटता और तैयारियां हैं।
Thursday, November 11, 2010
राष्ट्रमंडल खेलों में भारतः 2010 के स्वर्ण पदक विजेता
2010 में भारत के स्वर्ण पदक
गगन नारंग-अभिनव बिंद्रा- (10 मीटर एयर राइफल पुरुष निशानेबाजी)
गगन नारंग-इमरान हसन खान- (50 मीटर एयर राइफल-3 पोजीशन निशानेबाजी पुरुष)
गगन नारंग- (10 मीटर एयर रायफल व्यक्तिगत पुरुष निशानेबाजी)
गगन नारंग- (50 मीटर रायफल व्यक्तिगत निशानेबाजी)
अनीशा सैय्यद-राही सर्नोबत- (25 मीटर पिस्टल महिला निशानेबाजी)
विजय कुमार-गुरुप्रीत सिंह- (25 मीटर रेपिड फायर पिस्टल युगल)
ओंकार सिंह-गुरुप्रीत सिंह- (10 मीटर एयर पिस्टल पुरुष निशानेबाजी)
ओंकार सिंह (10 मीटर एयर पिस्टल पुरुष एकल निशानेबाजी)
विजय कुमार (25 मीटर रेपिड फायर व्यक्तिगत निशानेबाजी)
विजय कुमार-हरप्रीत सिंह (25 मीटर सेंटर फायर पिस्टल निशानेबाजी)
हरप्रीत सिंह (25 मीटर सेंटर फायर पिस्टल व्यक्तिगत निशानेबाजी)
हिना सिद्धू-अन्नूराज सिंह (10 मीटर एयरपिस्टल महिला निशानेबाजी)
अनीशा सैय्यद- (25 मीटर पिस्टल महिला एकल निशानेबाजी)
ओंकार सिंह- (25 मीटर पिस्टल व्यक्तिगत निशानेबाजी)
राजेंद्र कुमार- (कुश्ती ग्रीको रोमन पुरुष 55 किलोग्राम)
रविंद्र सिंह- (कुश्ती ग्रीको रोमन पुरुष 60 किलोग्राम)
संजय कुमार- (कुश्ती ग्रीको रोमन पुरुष 74 किलोग्राम)
अनिल कुमार- (कुश्ती ग्रीको रोमन पुरुष 96 किलोग्राम)
गीता सिंह फोगट- (कुश्ती महिला 55 किग्रा फ्रीस्टाइल)
अलका तोमर- (कुश्ती महिला 59 किग्रा फ्रीस्टाइल)
अनीता तोमर- (कुश्ती महिला 67 किग्रा फ्रीस्टाइल)
योगेश्वर दत्त- (कुश्ती पुरुष 60 किग्रा फ्रीस्टाइल)
सुशील कुमार- (कुश्ती पुरुष 66 किग्रा फ्रीस्टाइल)
नर सिंह पंचम यादव- (कुश्ती पुरुष 74 किग्रा फ्रीस्टाइल)
यमनम रेनूबाला चानू (भारोत्तोलन महिला 58 किग्रा)
कतूलू रवि कुमार (भारोत्तोलन पुरुष 69 किग्रा)
सुरंजय सिंह- (मुक्केबाजी फ्लाईवेट पुरुष 52 किग्रा)
परमजीत समोटा - (मुक्केबाजी लाइट सुपर हेवीवेट पुरुष 52 किग्रा)
मनोज कुमार - (मुक्केबाजी लाइट वेल्टरवेट पुरुष 64 किग्रा)
सायना नेहवाल- (बैडमिण्टन महिला एकल)
अश्वनी पोनप्पा-ज्वाला गट्टा- (बैडमिण्टन महिला युगल)
दीपिका कुमारी-डोला बनर्जी-बोम्बैयाला देवी लैसरामः (तीरंदाजी महिला रिकर्व टीम)
दीपिका कुमारीः (तीरंदाजी रिकर्व महिला व्यक्तिगत)
राहुल बनर्जीः (तीरंदाजी रिकर्व व्यक्तिगत पुरुष)
सोमदेव देवबर्मनः (टेनिस, पुरुष एकल)
कृष्णा पूनियाः (एथलेटिक्स, महिला डिस्कस थ्रो)
मंजीत कौर, सिनी जोस, अश्वनी अन्कुजी, मंदीप कौरः (एथलेटिक्स, महिला 4 गुणा 400 मीटर रिले)
शुभाजीत साहा, अंचता शरत कमलः (टेबिल टेनिस, पुरुष युगल)
गगन नारंग-अभिनव बिंद्रा- (10 मीटर एयर राइफल पुरुष निशानेबाजी)
गगन नारंग-इमरान हसन खान- (50 मीटर एयर राइफल-3 पोजीशन निशानेबाजी पुरुष)
गगन नारंग- (10 मीटर एयर रायफल व्यक्तिगत पुरुष निशानेबाजी)
गगन नारंग- (50 मीटर रायफल व्यक्तिगत निशानेबाजी)
अनीशा सैय्यद-राही सर्नोबत- (25 मीटर पिस्टल महिला निशानेबाजी)
विजय कुमार-गुरुप्रीत सिंह- (25 मीटर रेपिड फायर पिस्टल युगल)
ओंकार सिंह-गुरुप्रीत सिंह- (10 मीटर एयर पिस्टल पुरुष निशानेबाजी)
ओंकार सिंह (10 मीटर एयर पिस्टल पुरुष एकल निशानेबाजी)
विजय कुमार (25 मीटर रेपिड फायर व्यक्तिगत निशानेबाजी)
विजय कुमार-हरप्रीत सिंह (25 मीटर सेंटर फायर पिस्टल निशानेबाजी)
हरप्रीत सिंह (25 मीटर सेंटर फायर पिस्टल व्यक्तिगत निशानेबाजी)
हिना सिद्धू-अन्नूराज सिंह (10 मीटर एयरपिस्टल महिला निशानेबाजी)
अनीशा सैय्यद- (25 मीटर पिस्टल महिला एकल निशानेबाजी)
ओंकार सिंह- (25 मीटर पिस्टल व्यक्तिगत निशानेबाजी)
राजेंद्र कुमार- (कुश्ती ग्रीको रोमन पुरुष 55 किलोग्राम)
रविंद्र सिंह- (कुश्ती ग्रीको रोमन पुरुष 60 किलोग्राम)
संजय कुमार- (कुश्ती ग्रीको रोमन पुरुष 74 किलोग्राम)
अनिल कुमार- (कुश्ती ग्रीको रोमन पुरुष 96 किलोग्राम)
गीता सिंह फोगट- (कुश्ती महिला 55 किग्रा फ्रीस्टाइल)
अलका तोमर- (कुश्ती महिला 59 किग्रा फ्रीस्टाइल)
अनीता तोमर- (कुश्ती महिला 67 किग्रा फ्रीस्टाइल)
योगेश्वर दत्त- (कुश्ती पुरुष 60 किग्रा फ्रीस्टाइल)
सुशील कुमार- (कुश्ती पुरुष 66 किग्रा फ्रीस्टाइल)
नर सिंह पंचम यादव- (कुश्ती पुरुष 74 किग्रा फ्रीस्टाइल)
यमनम रेनूबाला चानू (भारोत्तोलन महिला 58 किग्रा)
कतूलू रवि कुमार (भारोत्तोलन पुरुष 69 किग्रा)
सुरंजय सिंह- (मुक्केबाजी फ्लाईवेट पुरुष 52 किग्रा)
परमजीत समोटा - (मुक्केबाजी लाइट सुपर हेवीवेट पुरुष 52 किग्रा)
मनोज कुमार - (मुक्केबाजी लाइट वेल्टरवेट पुरुष 64 किग्रा)
सायना नेहवाल- (बैडमिण्टन महिला एकल)
अश्वनी पोनप्पा-ज्वाला गट्टा- (बैडमिण्टन महिला युगल)
दीपिका कुमारी-डोला बनर्जी-बोम्बैयाला देवी लैसरामः (तीरंदाजी महिला रिकर्व टीम)
दीपिका कुमारीः (तीरंदाजी रिकर्व महिला व्यक्तिगत)
राहुल बनर्जीः (तीरंदाजी रिकर्व व्यक्तिगत पुरुष)
सोमदेव देवबर्मनः (टेनिस, पुरुष एकल)
कृष्णा पूनियाः (एथलेटिक्स, महिला डिस्कस थ्रो)
मंजीत कौर, सिनी जोस, अश्वनी अन्कुजी, मंदीप कौरः (एथलेटिक्स, महिला 4 गुणा 400 मीटर रिले)
शुभाजीत साहा, अंचता शरत कमलः (टेबिल टेनिस, पुरुष युगल)
Friday, October 22, 2010
दुनिया का सबसे बड़ा पुरस्कार- नोबेल
यह सच है कि पुरस्कार पाने की चाहत में कोई शोध या अविष्कार नहीं किया जाता, फिर भी मेहनत के लिए पुरस्कार पाना किसे पसंद नहीं होता। नोबेल अवार्ड दुनियाभर में सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कार है। यह एक ऐसा पुरस्कार है जिसे पाने का सपना हर वैज्ञानिक देखता है। नोबेल पुरस्कार शांति, साहित्य, भौतिकी, रसायन, चिकित्सा विज्ञान और अर्थशास्त्र के क्षेत्र में दिए जाते हैं। नोबेल पुरस्कार के तहत पदक, नोबेल प्रशस्ति पत्र और दस बिलियन क्रोनर (स्वीडन की मुद्रा) दिए जाते हैं। वर्ष 1901 में पहले नोबेल पुरस्कार विजेता को 150782 स्वीडिश क्रोन दिए गए। यह राशि परिवर्तित होती रहती है लेकिन 2001 से इस राशि में कोई परिवर्तन नहीं किया गया है। इस पुरस्कार की शुरुआत स्वीडिश रसायनशास्त्री और उद्योगपति अल्फ्रेड नोबेल की स्मृति में की गई और इसे उनकी पुण्यतिथि 10 दिसम्बर को प्रदान किया जाता है। नोबेल पुरस्कारों की स्थापना अल्फ्रेड के वसीयतनामे के अनुसार 1897 में हुई। उन्होंने ज्ञान के पांच क्षेत्रों में मानवता को लाभ पहुंचाने के लिए पुरस्कारों की स्थापना की इच्छा जताई थी। नोबेल फाउंडेशन की स्थापना 19 जून 1900 को हुई और पहली बार 1901 में नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया। पुरस्कार से जुड़े मामलों की देखरेख नोबेल फाउंडेशन के जिम्मे है। शांति का नोबेल व्यक्ति के अलावा किसी संस्था को भी प्रदान किया जा सकता है जबकि अन्य पुरस्कार सिर्फ व्यक्तियों को दिए जाते हैं। इन पुरस्कारों के चयन में नोबेल फाउंडेशन की कोई भूमिका नहीं होती।कौन थे अल्फ्रेड नोबेल
रसायन शास्त्री अल्फ्रेड बर्नाड नोबेल का जन्म 21 अक्टूबर 1833 को स्वीडन की राजधानी स्टॉकहोम में हुआ था। वे आठ साल की आयु में परिवार के साथ रूस चले गए। उन्होंने कुल 355 अविष्कार किए, जिनमें डायनामाइट (1867) का अविष्कार भी शामिल है। 10 दिसम्बर 1896 को मृत्यु से पूर्व उन्होंने अपनी विपुल संपत्ति का एक बड़ा भाग एक ट्रस्ट के लिए सुरक्षित रख दिया था। उनकी इच्छा थी कि इस राशि के ब्याज से हर वर्ष उन लोगों को सम्मानित किया जाए जिनका काम मानवजाति के लिए कल्याणकारी हो। स्वीडिश बैंक में जमा इस राशि के ब्याज से नोबेल फाउंडेशन यह पुरस्कार प्रदान करता है।
कौन करता है चुनाव
अल्फ्रेड नोबेल की वसीयत के अनुसार चार संस्थान यह पुरस्कार प्रदान करते हैं। स्टॉकहोम की द रॉयल एकेडमी आफ साइंसेज भौतकी और अर्थशास्त्र का पुरस्कार देती है जबकि स्वीडिश एकेडमी और द कैरोलिंस्कार इंस्टीट्यूट को चिकित्सा का नोबेल प्रदान करने की जिम्मेदारी मिली है। ओस्लो में स्थित द नॉर्वियन नोबेल कमेटी शांति का नोबेल पुरस्कार देती है। नोबेल पुरस्कार के विजेता का चयन करने के लिए गहन शोध का सहारा लिया जाता है। चयन प्रक्रिया एक वर्ष पहले ही शुरू हो जाती है। पुरस्कार देने वाले संस्थान करीब छह हजार लोगों को योग्य व्यक्तियों के नाम प्रस्तावित करने के लिए आमंत्रित करते हैं। इन लोगों में नोबेल पुरस्कार प्राप्त लोग, विज्ञान जगत में महत्वपूर्ण काम करने वाले और प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों के सदस्य शामिल होते हैं। प्राप्त नामों की छंटनी के बाद दावेदारों की सूची बनाई जाती है। कोई व्यक्ति अपने नाम को खुद प्रस्तावित नहीं कर सकता, न ही किसी मृत व्यक्ति का इन पुरस्कारों के लिए नामांकन किया जा सकता है। हालांकि नामांकन के वक्त जीवित व्यक्ति को मरणोपरांत नोबेल पुरस्कार प्रदान किया जा सकता है। एक नोबेल समिति हर पुरस्कार के लिए प्राप्त नामों की हर वर्ष फरवरी से समीक्षा प्रारंभ करती है और विशेषज्ञों के सहयोग से पुरस्कार विजेताओं के नाम तय करती है। यह समिति सितम्बर के अंत तक अपनी सिफारिश पुरस्कार देने वाले संस्थानों को सौंप देती है, जिसे आम तौर पर मान भी लिया जाता है हालांकि इसे मानने की कोई बाध्यता नहीं है।
विवादित रह चुका है पुरस्कार
2010 में शांति के नोबेल विजेता ली ओ शाओ बी का चीन सरकार द्वारा विरोध नई बात नहीं है। इससे पूर्व भी यह पुरस्कार विवादित हो चुका है। 2009 में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा को पुरस्कृत किए जाने की दुनियाभर में आलोचना हुई थी। 1905 में अमेरिकी राष्ट्रपति थियोडोर रूजवेल्ट, 1973 में अमेरिकी रक्षा सचिव हेनरी किसिंजर, 1978 में कैम्प डेविड समझौते के लिए मिस्र के तत्कालीन राष्ट्रपति अनवर सादात को यह पुरस्कार आलोचना का विषय बना था। रूजवेल्ट पर आरोप था कि उन्होंने फिलीपींस में विद्रोह के विरुद्ध बल प्रयोग किया। वहीं किसिंजर पर कंबोडिया में बमबारी कराने और सादात के विरुद्ध इजरायल से युद्ध का आरोप समिति ने नजरअंदाज कर दिया। 2007 में अमेरिकी उपराष्ट्रपति अल गोर पर्यावरण संरक्षण पर यह पुरस्कार मिला जबकि उनका इस क्षेत्र से कोई वास्ता नहीं था। इसी तरह 1992 में अपनी आत्मकथा के लिए साहित्य का नोबेल पाने वाले राइगोबेटा मेंचु पर यह आरोप लगा कि आत्मकथा में तमाम असत्य बातें लिखी गई हैं।
भारतीय और भारतीय मूल के विजेता
रवींद्रनाथ ठाकुर (1861-1943) : वह साहित्य का नोबेल पाने वाले पहले भारतीय थे। उन्हें 1913 का यह पुरस्कार उनकी रचना गीतांजलि के लिए यह पुरस्कार दिया गया।
चंद्रशेखर वेंकटरमन (1888-1970) : वह भौतिकी का नोबेल पाने वाले पहले भारतीय थे। प्रकाश के प्रकीर्णन पर उत्कृष्ट कार्य के लिए वर्ष 1930 में उन्हें नोबेल पुरस्कार दिया गया। उनका आविष्कार उनके ही नाम पर रामन प्रभाव के नाम से जाना जाता है।
हरगोबिंद खुराना (1922-1979): खुराना को चिकित्सा के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार दिया गया। ऐमिनो अम्लों की संरचना तथा आनुवांशिकीय गुणों का संबंध समझने के लिए उनकी खोज के लिए उन्हें अन्य दो अमेरिकी वैज्ञानिकों के साथ सन 1968 का नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया।
मदर टेरेसा (1910-1997): मदर टेरेसा को 1979 में शांति का नोबेल अवार्ड दिया गया। हालांकि वह अल्बानिया में जन्मीं थीं लेकिन 1928 से उन्होंने कलकत्ता में सेवाकार्य आरंभ कर दिए। सेवा क्षेत्र भारत होने की वजह से उन्हें भारतीयों की श्रेणी में रखा जाता है।
सुब्रह्मण्यम चंद्रशेखर (1910-1995): उन्हें 1983 में भौतिक शास्त्र का नोबेल पुरस्कार दिया गया। उन्हें यह पुरस्कार सितारों की संरचना और क्रमिक विकास संबंधी भौतिकीय प्रक्रियाओं के अध्ययन के लिए मिला।
अमर्त्य सेन (1933): अर्थशास्त्र में नोबेल पाने वाले सेन पहले एशियाई हैं। उन्हें 1998 में लोक कल्याणकारी अर्थशास्त्र की अवधारणा के प्रतिपादन के लिए यह प्रतिष्ठित पुरस्कार दिया गया।
वीएस नॉयपॉल (1932): विद्याधर सूरजप्रसाद नॉयपॉल को 2001 में साहित्य का नोबेल पुरस्कार दिया गया। उत्तर औपनिवेशिक लेखन के स्तंभ नॉयपॉल की चर्चित पुस्तकें हैं इन ए फ्री स्टेट और हाउस आफ मिस्टर विश्वास। वह त्रिनिदाद के नागरिक हैं।
आरके पचौरी (1940): तकनीकी तौर पर इंटर गवर्नमेंटल पैनल फॉर क्लाइमेट चेंज (आईपीसीसी)को 2007 में शांति का नोबेल दिया गया लेकिन पैनल का अध्यक्ष होने के नाते आरके पचौरी ने इसे ग्रहण किया। पुरस्कार पर्यावरण में बदलाव के मानव निर्मित कारणों के प्रतिपादन और प्रसार के लिए दिया गया।
वेंकटरमन रामकृष्णन (1952): इन्हें 2009 में रसायन शास्त्र का नोबेल पुरस्कार दिया गया। भारत में जन्मे पर अब अमेरिकी नागरिक रामचंद्रन को राइबोसोम की संरचना और कार्यप्रणाली पर किए महत्वपूर्ण अध्ययन के लिए यह पुरस्कार मिला।
उल्लेखनीय बिंदु
** चार नोबेल पुरस्कार विजेताओं को उनकी सरकारों ने पुरस्कार स्वीकार करने की अनुमति नहीं दी। जर्मन तानाशाह एडोल्फ हिटलर ने तीन जर्मनों रिचर्ड कुहन (रसायनशास्त्र, 1938), एडोल्फ बुटेनंट (रसायनशास्त्र, 1939) एवं गरहार्ड डोमाग्क (औषधि, 1939) और सोवियत यूनियन की सरकार ने बोरिस पास्टरनाक (साहित्य, 1958) को पुरस्कार नहीं लेने के लिए दबाव डाला।
** दो नोबेल पुरस्कार विजेताओं जीन-पॉल सारत्रे (साहित्य, 1964) और ली डक थो (शांति, 1973) ने पुरस्कार लेने से इंकार कर दिया। सारत्रे ने किसी भी आधिकारिक सम्मान को लेने से इंकार किया तो ली डक थो ने वियतनाम में खराब स्थिति के कारण पुरस्कार से मना किया।
** राष्ट्रपिता गांधी जी को 1937, 1938, 1939 और 1948 में नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामित किया गया। कहा जाता है कि वह 1948 में पुरस्कार के बेहद करीब थे लेकिन उनकी हत्या कर दी गई। इस पुरस्कार के लिए चूंकि मात्र जीवित व्यक्ति का ही चयन किया जाता है इसलिये उन्हें यह पुरस्कार नहीं मिल सका। 1948 में शांति के नोबेल के लिए किसी को योग्य नहीं माना गया।
** छह विजेताओं ने एक से अधिक बार नोबेल पुरस्कार जीता, जिनमें द इंटरनेशनल कमिटी ऑफ द रेड क्रॉस सोसाइटी ने तीन बार नोबेल शांति पुरस्कार जीता।
** पहली महिला नोबेल पुरस्कार विजेता मेरी क्यूरी थी, जिन्हें 1903 में भौतिकी के लिए नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया।
** वर्ष 1940 और 1942 में द्वितीय विश्वयुद्ध के कारण पुरस्कार नहीं दिए गए।
वर्ष 2010 के नोबेल पुरस्कार
शांतिः चीन के लिए लीओ शाओ बी को। बी को मानवाधिकार संरक्षण के लिए उनके लंबे संघर्ष पर दिया गया है। वे इन दिनों चीन की जेल में कैद हैं। वह उग्र टकराव के बजाए शांति ढंग से राजनीतिक बदलाव के पक्षधर हैं। इस पुरस्कार के लिए रिकॉर्ड 37 नामांकन आए, ली के नाम का तिब्बती धर्मगुरु दलाई लामा ने भी समर्थन किया था।
अर्थशास्त्रः अमेरिका के पीटर डायमण्ड, डेल मार्टनसन और ब्रिटेन के क्रिस्टोफर पिसारिड्स को संयुक्त रूप से। उन्हें यह पुरस्कार बेरोजगारी पर आर्थिक नीतियों के प्रभाव की व्याख्या करने वाले सिद्धांत के विकास के लिए दिया गया है। इनके द्वारा विकसित मॉडल से यह समझने में मदद मिलती है कि किस तरह के नियमन और आर्थिक नीतियों से बेरोजगारी, रोजगार और वेतन प्रभावित होते हैं।
साहित्यः स्पेनिश भाषा के प्रसिद्ध लेखक पेरू के मारिओ वर्गास लोसा को। लोसा के लेखन में संघर्ष और वंचित तबकों की दास्तां दिखती है। वर्ष 1982 में कोलंबियाई लेखक गेब्रियाल गार्सिया मार्खेज के बाद यह पुरस्कार पाने के वाले पहले दक्षिण अमेरिकी हैं। 1993 में स्पेन की नागरिकता स्वीकार करने वाले लोसो को स्पेनिश भाषा के प्रतिष्ठित सम्मान सर्वेन्तेस से भी सम्मानित किया जा चुका है।
चिकित्साः ब्रिटेन के डॉ. राबर्ट एडवर्ड्स को। एडवर्ड को इन विट्रो फर्टिलाइजेशन (आईवीएफ) के अविष्कार के लिए मिला है। 1950 के दशक में रॉबर्ट के किए प्रयासों के परिणामस्वरूप 25 जुलाई 1978 को विश्व के पहले टेस्ट ट्यूब बेबी का जन्म हुआ। लुई ब्राउन नामक इस बेबी के बाद से अब तक दुनियाभर में 40 लाख बच्चों को जन्म हो चुका है।
रसायनशास्त्रः अमेरिका के रिचर्ड हेक और जापानी अनुसंधानकर्ता ई इची निगेशी एवं अकीरा सुजुकी को संयुक्त रूप से। उन्होंने ऐसी रासायनिक पद्धति विकसित की है जिससे वैज्ञानिक कैंसर की दवाओं का परीक्षण करने और कंप्यूटर के पतले स्क्रीन बनाने में सक्षम हुए। यह पैलाडियन कैटेलाइज्ड क्रॉस कप्लिंग इन आर्गेनिक सिस्टम्स के नाम से जाना जाता है।
भौतिकीः रूस में जन्मे आंद्रे जीन और कोंस्तांतिन नोवोसेलोव को संयुक्त रूप से। पुरस्कार ग्रेफीन नामक नए पदार्थ की खोज के लिए मिला है जो इलेक्ट्रानिक्स क्रांति को नई दिशा दे सकते हैं। दोनों वैज्ञानिक ब्रिटेन में कार्यरत हैं। ग्रेफीन कार्बन की सूक्ष्म परत होती है जिसकी मोटाई एक अणु के बराबर होती है। व्यावहारिक तौर पर यह पारदर्शी और अच्छा सुचालक है। ग्रेफीन से इलेक्ट्रानिक सामान के लिए पारदर्शी टचस्क्रीन का निर्माण किया जा सकता है। प्रकाशीय पैनलों और सौर सेलों के उत्पादन में भी यह सहायक सिद्ध हो सकता है।
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